लाहौर में जन्मे ओपी नैयर की शख्सियत को बॉलीवुड के अलहदा संगीतकारों में शुमार किया जाता है।उनकी पहली खासियत थी विद्रोही स्वभाव। बचपन में नैयर ने पिता जी से बहुत मार खाई और एक दिन विरोध में घर ही छोड़ दिया।
नैयर ने पढ़ाई-लिखाई नहीं की, संगीत में मन रमता था, इसलिए उन्होंने लाहौर के एक गर्ल्स स्कूल में संगीत शिक्षक की नौकरी कर ली, पर कुछ ही दिनों बाद आकाशवाणी में नौकरी कर ली। उस वक्त के लोकप्रिय गायक सीएच आत्मा के लिए गीत बनाया, जिसके बोल थे ‘प्रीतम आन मिलो’। इस गीत के लिए ओपी नैयर को मेहनताना मिला बारह रुपये। इन बारह रुपयों से शुरू हुआ सिलसिला बाद में लाख रुपये फिल्म तक भी पहुंचा। नैयर अपने जमाने के सबसे महंगे संगीतकार थे। जब विभाजन हुआ तो त्रासदी के दौर में भी जो सौगातें पाकिस्तान से हिन्दुस्तान के हिस्से आईं उनमें से एक ओपी नैयर भी थे।
लाहौर से पंजाब पहुंचने वाले ओपी नैयर शराब के शौकीन हो
गए थे। एक दिन मुंबई जाने का खयाल आया तो चल पड़े हीरो बनने। कामयाबी नहीं मिली तो
गायक बनने की भी कोशिश की। एक दिन घूमते-फिरते कृष्ण केवल से उनकी मुलाकात हो गई। कृष्ण
केवल उन दिनों ‘कनीज (1949)’ बनाने की सोच रहे थे और उन्हें इस फिल्म के लिए कंपोजर
की जरूरत थी। कनीज में नैयर साहब ने बैकग्राउंड स्कोर दिया। इस फिल्म के बाद नैयर साहब
ने कुछ संगीतकारों के साथ इक्का-दुक्का गीत बनाए। 1952 में आई फिल्मों ‘आसमान’ और
‘छम छमा छम’ में उन्होंने पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत दिया था। बतौर संगीतकार
‘आसमान’ नैयर की पहली फिल्म रही। ये फिल्में कुछ कमाल नहीं कर पाईं लेकिन इनके जरिए
फिल्म जगत में नैयर की जान-पहचान का दायरा बड़ा हो गया।
ओपी नैयर की अच्छी परिचित गीता दत्त ने इस बुरे वक्त में
उन्हें गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी। तब इस बात का अंदाजा शायद नैयर को भी नहीं रहा
होगा कि यह मुलाकात उनको क्या से क्या बनाने जा रही है। गुरुदत्त ने उन्हें ‘आर-पार
(1954)’ में संगीत देने की जिम्मेदारी दी। गुरुदत्त की अगली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस
55 (1955)’ का संगीत भी ओपी नैयर ने दिया। इन दोनों फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें हिंदी
फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने ‘तुमसा नहीं देखा,’ ‘बाप रे बाप,’
‘हावड़ा ब्रिज,’ ‘सीआईडी,’ ‘फागुन’ आदि फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया। ‘सीआईडी’ में
ओपी नैयर ने आशा भोंसले को पहली बार मौका दिया और इस जोड़ी ने बाद में कई हिट गाने
दिए।
‘संगीतकार’ ओपी नैयर ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं
ली थी लेकिन संगीत के सीमित ज्ञान के सहारे तिलिस्मी धुनें रचीं। कुछ गाने जैसे ‘मांग
के साथ तुम्हारा’ या ‘जरा हौले हौले चलो मोरे साजना’ सुनते हुए जो घोड़े की टापों की
आवाज सुनाई देती है, वह ओपी नैयर की पहचान है। ऐसे ही नया दौर के मशहूर गाने ‘उड़े
जब जब जुल्फें तेरी’ में तालियों का इस्तेमाल गाने को शानदार शुरुआत देता है। मुखड़े
और अंतरे के बीच सितार का सोलो प्रयोग सिर्फ नैयर के संगीत में मिलेगा। वे तालियां,
सीटी और घोड़ों की टापों से संगीत निकालते थे। ओपी नैयर की संगीत के साथ प्रयोगधर्मिता
भले ही श्रोताओं को लुभाती हो लेकिन 1950 में आकाशवाणी ने उनके गानों पर प्रतिबंध लगा
दिया था। तर्क यह था कि इन गानों को संगीत की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। नैयर कई
मामलों में ट्रेंड सेटर कहे जा सकते हैं। जैसे कॉमेडियन के लिए पूरे तीन मिनट का गाना
बनाना, अभिनेत्रियों से संगीत के हिसाब से अदाएं करवाना वगैरह।
यदि विद्रोह किसी के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है तो
उसका जिद्दी होना भी स्वाभाविक है। तभी तो लता मंगेशकर जैसी गायिका से कभी न गवाने
की जिद पर नैयर आखिर तक डटे रहे। लता और ओपी नैयर के बीच इस बेरुखी के पीछे एक किस्सा
है। हुआ यूं कि ओपी नैयर की पहली फिल्म ‘आसमान’ के आठ गानों में से एक गाना सहनायिका
पर फिल्माया जाना था। नैयर यह गाना लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे। लता मंगेशकर उस
समय की सबसे सफल गायिका थीं। उन्होंने सहनायिका के लिए गाना अपना अपमान समझा और मना
कर दिया। बस यही बात नैयर साहब को चुभ गई और उन्होंने लता जी से तौबा कर ली। नैयर ने
आशा भोंसले और गीता दत्त से ही अपने सारे गाने गवाए। नैयर साहब के इसी जिद्दी और अक्खड़
मिजाज के चलते गीता दत्त, आशा भोसले और मोहम्मद
रफी से भी अनबन की खबरें आती रहीं। आशा भोसले से अनबन का नतीजा था कि 1974 में दोनों
ने साथ काम न करने का फैसला किया।
ओपी नैयर ने हमेशा मझोले फिल्मकारों के साथ काम किया।
फिर भी वे अपने दौर के सबसे महंगे संगीतकार रहे। बीआर चोपड़ा की ‘नया दौर’ इकलौती ऐसी
फिल्म है, जिसमें उन्होंने किसी बड़े बैनर तले काम किया। 1949 से लेकर 1974 के बीच
सिर्फ 1961 ही एक ऐसा साल था, जब उनकी कोई फिल्म नहीं आई। हालांकि 1974 में आशा भोंसले
का साथ छूटने बाद नैयर का करियर ढलान पर आ गया। उन्होंने दिलराज कौर, वाणी जयराम, कविता
कृष्णमूर्ति सबसे गवाया, पर गीतों में ‘वो’ बात नहीं आ पाई। नब्बे के दशक में भी दो-तीन
फिल्में आईं, मगर उनका भी हश्र वही रहा।
ओपी नैयर को संगीत के अलावा ज्योतिष और होम्योपैथी की
भी जानकारी थी। उनके रिटायरमेंट के बाद उनके प्रशंसक मरीज बनकर उनसे मिलने आते थे।
जो विद्रोही स्वभाव, जिद और अक्खड़पन नैयर को बचपन में ही मिल गया था, वह आखिरी वक्त
तक उनके साथ रहा। 28 जनवरी 2007 को उनकी मृत्यु हुई थी लेकिन जाते-जाते भी उन्होंने
अपनी जिद नहीं छोड़ी। अंत्येष्टि में परिवार का कोई व्यक्ति शामिल न हो, यह उनकी आखिरी
जिद थी।
- फ़िल्म समीक्षक: इदरीस खत्री,
ईमेल: nepathya.indore@gmail.com
