डॉ शंकर शेष का जन्म 2 अक्टूबर 1933 में बिलासपुर में हुआ। आठवीं कक्षा के छात्र, बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ शेष का लेखन कविता से प्रारंभ हुआ। कॉलेज में प्रवेश के साथ लेखन में रूचि बढ़ी। कालांतर में इनके अंदर का कवि विकसित हुआ “मित्र के नाम पाती” कविता प्रसिद्ध हुई। कवि सम्मेलनों में भी सफल हुए। आकाशवाणी के वे लोकप्रिय कलाकार थे। रेडियो नाटक में अभिनय भी किया। प्रथम नाटक लिखा ‘मूर्तिकार। डॉ शेष ने उन्हीं दिनों आंचलिक उपन्यास लिखा “तेंदु के पत्ते, जो छत्तीसगढ़ की पृष्टभूमि पर था। अन्य उपन्यास थे, ‘चेतना’, “धर्मक्षेत्रे-कुरूक्षेत्रे।
छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी भाषा से लगाव के कारण उन्होंने
छत्तीसगढ़ी का व्याकरण लिखा। इसी तरह भाषा विज्ञान में एम.ए. करते समय ‘टुलु’का अध्ययन कर उस पर पुस्तक लिखी। पीएच.डी. शोध के दौरान
लिखा गया उनका शोधपत्र “हिन्दी मराठी कथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन” शोधार्थियों के लिए उपयोगी रहा। बाद में उन्होंने अपना
ध्यान नाटक लेखन पर केन्द्रित किया। उन्होंने बच्चों के नाटकों का अनुवाद किया – “अपना
हाथ जगन्नाथ, “एक और गार्वो, “चल मेरे कद्दू। उनके कई नाटक मराठी, तेलगु, सिंधी, तमिल,
गुजराती में अनुवादित हुए तथा लगभग सभी विभिन्न भाषाओं में भी मंचित एवं लोकप्रिय हुए।
उनके नाटक आकाशवाणी-दूरदर्शन पर भी चर्चित रहे। दूरदर्शन
के लिए खास लिखा गया पहला नाटक था- ‘चेहरे, जो मुंबई दूरदर्शन से वीरेन्द्र शर्मा के
निर्देशन में प्रसारित और चर्चित हुआ। उनके नाटकों का मंचन तथा निर्देशन कई प्रसिद्ध
निर्देशकों ने किया, जैसे स्वर्गीय बी.वी. कारंथ, स्वर्गीय अरविंद देशपांडे, सत्यदेव
दुबे, मुश्ताक काक, अशोक गोस्वामी, विनायक चासकर, के.के. मेहता इत्यादि।
डॉ० शेष 1956 से लेखन के साथ जीवनपर्यंत सम्बद्ध रहे। स्टेट
बैंक ऑफ़ इंडिया, मुंबई के प्रमुख हिन्दी अधिकारी के पद पर नियुक्त रहते हुए नाट्य
लेखन एवं अन्य सर्जनात्मक कार्य करते रहे। साठोत्तरी पीढ़ी के प्रयोगधर्मी नाटककार
के रूप में डॉ० शंकर शेष की काफी ख्याति रही। उनके विभिन्न नाटकों एवं एकांकियों के
समय-समय पर प्रदर्शन होते रहे। डॉ० शेष मराठी भाषा भी जानते थे और उन्होंने मराठी से
कुछ नाटकों का अनुवाद भी किया था। नाटकों के अतिरिक्त वे फिल्मों के लिए कहानियाँ भी
लिखते थे और इसके लिए पुरस्कृत भी हुए। 28 अक्टूबर 1981 को श्रीनगर (कश्मीर) में उनका
निधन हो गया।
शंकर जी के व्यक्तित्व में कुशल प्रशासक, सफल नाटककार,
कवि एवं कथाकार के आयाम समाहित थे। उन्होंने आरंभ में कविताएँ भी लिखी थीं परंतु सर्वाधिक
प्रसिद्धि उन्हें नाटकों के क्षेत्र में ही मिली और प्रायः लोग उन्हें नाटककार के रूप
में ही जानने लगे। बाद में भी उन्होंने फिल्मों के लिए कहानियाँ भी लिखीं। शंकर शेष
ने “एक और द्रोणाचार्य”नामक नाटक में शिक्षा जगत में बढ़ते
राजनैतिक दबाव का वर्णन किया है, जिसके चलते नौजवान पीढ़ी का भविष्य अधंकारमय हो गया।
नाटककार ने शिक्षकों की उदासीनता पर तीखा कटाक्ष किया है कि शिक्षक आर्थिक, राजनैतिक
दबावों के चलते हार मान लेते हैं। पौराणिक कथा का सहारा लेकर आज की व्यवस्था के चारण
बन जाने वाले अध्यापक की त्रासदी को उन्होंने नाटक के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान
की है। नाटक में आज की व्यवस्था में शिक्षक वर्ग में तेजी से पनप रही सुविधाभोगी प्रवृत्ति
के कारण व्यवस्था से जुड़ने की विसंगति, जिससे जाने-अनजाने देश की भावी पीढ़ी का भविष्य
अन्धकारग्रस्त हो जाता है, का अकंन किया गया है। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य
और आधुनिक महाविद्यालय के प्राध्यापक के कुछ हद तक समानान्तर चित्रण से समकालीन ज्वलंत
समस्या को कलात्मक रूप से सामने रखने वाला यह नाटक एक सशक्त कृति के रूप में स्वीकृत
है।
बिन बाती के दीप, फंदी, रक्तबीज, बन्धन अपने-अपने, एक और
द्रोणाचार्य, अरे! मायावी सरोवर, कोमल गांधार, चेहरे, पोस्टर, खजुराहो का शिल्पी, बाढ़
का पानी : चंदन के द्धीप, घरौंदा, रत्नगर्भा, राक्षस, नयी सभ्यता : नये नमूने, आधी
रात के बाद, चेतना, धर्म कुरूक्षेत्र, एक साथ की गाथा, मूर्तिकार, चेहरे, तिल का ताड़
और कालजयी इनके लिखे हुए प्रसिद्ध नाटक हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने एकांकी भी लिखीं
- एक प्याला कॉफी, पुलिया, अजायबघर और त्रिभुज का चौथा कोण।
- कर्मवीर सिंह राजपूत, कर्मवीर थिएटर ग्रुप, भोपाल. सम्पर्क: 8982391713, 8770854573