Rohtasgarh kila bihar (ऐतिहासिक धरोहर)

रोहतास गढ़ - एक अनूठा ऐतिहासिक किला...

भारत के प्राचीन किलों में रोहतास गढ़ किले का नाम प्रमुखता से आता है, जिसके साथ अयोध्या के पौराणिक राजा हरिशचंद्र के पुत्र रोहिताश्व सहित गौड़ राजा शशांक, खरवार राजा प्रताप धवल, सूरी-वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी और शहंशाह अकबर के सेनापति राजा मान सिंह के नाम जुड़े हैं।

बिहार के रोहतास जिले की सोन-घाटी में कैमूर की पहाड़ी पर 1500 फुट की ऊंचाई पर स्थित रोहतास गढ़ का किला सदियों से शक्ति, साहस और श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में शान से खड़ा है। किले और दुर्ग जैसे शब्दों को सार्थक करता हुआ, यह प्राचीनतम व विशालतम यह किला अपने दुश्मनों के लिये हमेशा चुनौती बना रहा। इसको कोई भी सीधी लड़ाई से नहीं जीत सका है। इतिहास गवाह है कि अफगान योद्धा शेरशाह ने भी छल से ही इस पर कब्जा किया था।

रोहतास जिला मुख्यालय से रोहतास गढ़ की पहाड़ी तक पहुंचने में दो घंटे का समय लगता है। फिर यहां स्थित मेधा घाट से पहाड़ को काटकर बनी सीढ़ियों की चढ़ाई डेढ़ घंटे में पूरी कर किले की चहारदीवारी तक पहुंचा जा सकता है। बुलंद प्रवेश-द्वारों, मजबूत प्राचीरों, परकोटों, मीनारों, बुर्जी तथा तंग मार्गों की विशिष्ट संरचना व विस्तृत पहाड़ियों, दरों, घाटियों, खड़ी चट्टानों तथा घने जंगल एवं हिंसक पशुओं से घिरा यह किला सदैव अपराजेय रहा है।

रोहतास की सोन-घाटी से निकलकर सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) होते हुए विंध्य पर्वतमाला तक तथा दक्षिण में छोटा नागपुर पठार तक फैली कैमूर की पहाड़ियां इस क्षेत्र में जटिल भौगोलिक परिवेश का निर्माण करती हैं और सामरिक दृष्टि से विशिष्ट सुरक्षा प्रदान करती है। आज सोनभद्र क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का दूसरा बड़ा जिला है। विंध्य पर्वत माला के पूर्वी भाग में 483 कि.मी. के विस्तार में फैली कैमूर पहाड़ी, जिसपर रोहतास गढ़ का किला मौजूद है, चारों ओर से पहाड़ियों, नदियों, दरों, घाटियों से घिरा होने के कारण ज्यादा सुरक्षित था।

देश में ब्रिटिश युग की शुरुआत के पहले तक पूर्वोत्तर भारत में शक्ति के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रहे रोहतास गढ़ के किले ने अपने लम्बे अतीत और इतिहास के दौर में जहां अयोध्या के पौराणिक राजा हरिशचंद्र के पुत्र रोहिताश्व के प्रताप देखे हैं, तो वहीं अपने मित्र की कुटिल चाल की परवाह किये बिना उसके हरम की जवान और बूढ़ी औरतों और बच्चों को पनाह देने के लिये खुद बेदखल होकर किले के द्वार खोल देनेवाले एक हिंदू राजा की सदाशयता भी देखी है। इस किले ने अपने प्राचीरों से उठकर फरीद खां (शेरशाह) जैसे गुमनाम शख्स को दिल्ली की गद्दी पर बैठते देखा है, तो शहंशाह अकबर व उनके सिपहसालार मान सिंह के शासन-प्रशासन की धमकियां भी देखी हैं। शाहमल जैसे विश्वासघाती दीवान को चंद सिक्कों के लिये किले की चाबी अंगरेजों को सौंपते हुए देखा है, तो इसी किले से आजादी के दीवाने अमर सिंह को प्राणों की बाजी लगाते भी देखा है। इसने अपने गढ़ में सन् 1857 के वीर बांकुरे बाबू कुंवर सिंह को विजय-पताका लहराते हुए देखा है, तो आजादी के बाद 62 वर्षों तक अपराधियों के चंगुल में गुमनाम रही इस ऐतिहासिक धरोहर को मुक्त कराकर एक जांबाज पुलिस अधिकारी को इस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते भी देखा है।

इसी तरह अंगरेज पेंटर विलियम डेनियल के साथ रोहतास गढ़ की यात्रा करनेवाले होबार्ट काउंटर सन 1835 में लंदन से प्रकाशित पुस्तक ‘द ओरिएंटल एनुअल‘ (सीन्स इन इंडिया) में बताते हैं कि जिस पर्वत पर यह किला मौजूद है, वह मूलतः किसी भी कोण से गमनीय नहीं है और इसके ऊपर जिस विशालता तथा मजबूती से मीनार युक्त प्राचीरें, खड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गई सीढ़ियां और प्रवेश-द्वार निर्मित हैं, वे किसी भी मानवीय आक्रमण को मात देने और किसी भी आक्रमणकारी के साहस को तोड़ने के लिये काफी हैं। होबार्ट काउंटर बताते हैं कि चट्टानों के बड़े-बड़े टुकड़ों को जिस मजबूती के साथ जोड़कर किले की दीवारें बनाई गई हैं, उनमें आज भी कोई दरार नहीं दिखाई देती जो प्राचीन सैन्य वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। बिना किसी साज-सज्जा के बिना भी इसकी विशालता अत्यंत प्रभावशाली है। काउंटर के साथ गये पेंटर डेनियल ने रोहतास गढ़ के कई आकर्षक चित्र बनाये थे, जो आज ब्रिटिश म्यूजियम में संग्रहित हैं।

रोहतास गढ़ किले के निर्माण के इतिहास की बात की जाए तो इसके कई पौराणिक संदर्भ मिलते हैं।

रोहतास का नाम पौराणिक सत्यवादी राजा हरिशचंद्र के पुत्र रोहिताश्व के नाम पर पड़ा है। रामायण के बाल-कांड में वर्णित है कि अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र इक्ष्वाकुवंशी (सूर्यवंशी) थे। ‘जाति भाष्कर‘ ग्रंथ के अनुसार हरिशचंद्र पुत्र रोहिताश्व के वंश के राजा चम्प (जिन्होंने चम्पा नगरी की स्थापना की थी) की 31वीं पीढ़ी में श्रीराम चंद्र हुए। यही कारण है कि रोहित और रोहिताश्व नगर (रोहतास) का उल्लेख भागवत, हरिवंश, स्कंध, पद्म आदि पुराणों, देवी भागवत, ऐतरेय ब्राह्मण सहित रामायण, महाभारत आदि पौराणिक ग्रंथों में आया है, जिनमें वर्णित है कि राजा हरिशचंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने वरूण के भय से किसी अज्ञात स्थान में शरण ली थी, जिसकी पहचान कैमूर की पहाड़ी के रूप में की गयी है, जो कालांतर में रोहिताश्व के नाम पर रोहतास‘ कहलाया।

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