गोवा के अर्वलम की गुफाएं...

ज्यादातर लोग गोवा के इतिहास को पुर्तगाली शासन के साथ जोड़कर देखते हैं लेकिन सच यह है कि गोवा कभी कई हिंदु राजवंशो का क्षेत्र हुआ करता था, जो पूरे राज्य में अपनी पहचान छोड़कर गए हैं। प्रशंसनीय समुद्र तटों और झरनों के अलावा, गोवा विरासत वास्तुकला के लिए सबसे अधिक आकर्षण वाले स्थलों में से एक है। गोवा एक प्राचीन राज्य है, इसलिये यहाँ पर वास्तुकला से संबन्धित विरासत भी पाई जाती है। गोवा में मौजूद ऐतिहासिक स्मारकों का एक सुंदर उदाहरण अर्वलम गुफाएं या “पांडव गुफाएं” हैं। उत्तरी गोवा के बिचोलिम शहर में स्थित इन गुफाओं में प्राचीन रॉक कट गुफाएं हैं, जो हमें पौराणिक कथाओं में खड़े होने का मौका देती हैं। इन गुफाओं की उत्पत्ति छठी शताब्दी तक की मानी जाती है।


लोकप्रिय पांडव गुफाओं के रूप में जानी जाने वाली इन गुफाओं ने महाकाव्य महाभारत के पांच पांडवों से अपना नाम प्राप्त किया है। किदवंती के अनुसार, पांडवों ने अपने निर्वासन के दौरान इन गुफाओं में शरण ली थी। गुफा परिसर में पांच विभाग और शिवलिंगों की मौजूदगी इस तथ्य को प्रसांगिकता प्रदान करती है। हालांकि, इस जगह के पास बुद्ध की विशाल प्रतिमा की मौजूदगी के कारण गुफाओं को बौद्ध मूल के रूप में भी दावा किया गया है। गुफाओं की स्थापत्य शैली भी बौद्ध पक्ष की ओर से बोलती है। वर्षों से गुफाओं की उत्पत्ति के बारे में राय द्विपक्षीय रही हैं।

गोवा की राजधानी पणजी से, सड़क मार्ग से एक घंटे की दूरी पर उत्तर गोवा के शहर बिचोलिम में एक गांव है जिसका नाम अर्वलम है। अपने सुंदर झरनों की वजह से ये जगह सैलानियों में बहुत लोकप्रिय है। लेकिन झरनों के पास कुछ ही दूरी पर गुफाओं का एक समूह है जो डेढ़ हजार साल पुराना है। अर्वलम गुफाएं गोवा की प्रारंभिक हिंदू वास्तु-कला का नमूना हैं। स्थानीय लोग इसे पांडव गुफा कहते हैं। किवदंती के अनुसार बारह वर्ष के वनवास के दौरान पांडव अपनी पत्नी द्रोपदी के साथ इन गुफाओं में कुछ समय के लिये ठहरे थे।

पश्चिम भारत में गुफाएं जहां बजालत (लाल रंग का आग्नेय बलुआ पत्थर) चट्टान काटकर बनाई गईं थी, वहीं अर्वलम गुफाएं मानव निर्मित गुफाएं हैं, जिन्हें मखराला (लैटराइट) चट्टानों को काटकर बनाया गया है। यहां कुल छह कमरे हैं, जिनमें से पहले पांच कमरों का प्रयोग मंदिर के रुप में होता था। छठे कमरे का उपयोग शायद रसोईघर या स्टोर के रुप में होता होगा क्योंकि कमरे के किनारे एक प्लेटफॉर्म बना हुआ है।

कुछ इतिहासकार अर्वलम गुफाओं को पांचवी सदी और कुछ छठी सदी का बताते हैं। ये वो समय था जब गोवा पर कदंब राजवंश (345-525) का शासन हुआ करता था। कदंब कर्नाटक का प्राचीन शाही परिवार था, जो अपनी राजधानी बनवासी (मौजूदा समय में उत्तरा कन्नड जिला) से उत्तर कर्नाटक और कोंकण पर शासन करता था। दक्कन में वे सातवाहन राजवंश के बाद आए थे और वे पश्चिमी गंगा राजवंश के समकालीन थे। कदंब राजवंश भगवान शिव के उपासक थे।

अर्वलम गुफाओं के पहले कमरे में एक वेदी है। वेदी के छेद में एक शिवलिंग है जो भूरे रंग के बजालत पत्थर का बना है। इससे पता चलता है कि ये गुफाएं अपनी प्रकृति में शायद शिवपंथ की रही होंगी। अन्य चार कमरों में उनकी वेदियों के बीच लिंग की तरह की मूर्तियां हैं लेकिन ये कहना मुश्किल है कि ये शिवलिंग हैं। उदाहरण के लिये अवलम गुफा मंदिरों के तीसरे कमरे में रखे लिंग पर ब्रह्मी लिपि में एक पंक्ति का अभिलेख है जो कुछ इस तरह है-संबालुरु-वाली रविह। इसका अर्थ है “संबा शहर का निवासी रवि‘‘। सूर्य को रवि भी कहा जाता है और इसलिये शायद तीसरा कमरा सूर्य देवता को समर्पित होगा।

पुरातत्वविद एम.एस. नागराजा राव के अनुसार “सूर्य देवता के कई नामों में से एक रवि का, संबा द्वारा स्थापित शहर के निवासी के रुप में संबा पुराण में कई बार उल्लेख है। संबा भगवान कृष्ण के पुत्र थे। वह कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। सूर्य देवता ने उनका ये रोग ठीक कर दिया था। सूर्य देवता का आभार मानते हए संबा ने शायद संबापुरा शहर में सूर्य देवता का मंदिर बनवाया था।‘‘ दिलचस्प बात ये है कि सन 1964 में किए गए एक सर्वे में, दक्षिण-पश्चिम अर्वलम से छह कि.मी. दूर कुडनम शहर में एक पुराने मंदिर का ढांचा मिला था, जिसमें सूर्य देवता की एक छोटी मूर्ति थी। हो सकता है कि प्राचीन समय में कुडनम और अर्वलम को संबापुरा कहा जाता हो।

कला इतिहासकारों का मानना है कि अगर एक लिंग शिव को और दूसरा लिंग सूर्य को समर्पित है, तो पांच में से तीसरा लिंग शायद स्कंद या कार्तिकय को समर्पित होगा और ये शिव-कार्तिकय-सूर्य के संबंध को संपूर्ण करता है। इस तरह से इस मंदिर गुफा को अब तक भारत में अपनी तरह की एक अनोखी गुफा माना जा सकता है।

इसके अलावा गुफाओं के बारे में और कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, बस अंदाजे ही लगाए गए हैं। माना ये भी जाता है कि ये गुफाएं कभी बौद्ध प्रकृति की रही होंगी और यहां से गुजरने वाले बौद्ध भिक्षु इनका उपयोग विहार के रुप में करते होंगे। बाद में इन्हें शिव गुफाओं मे तब्दील कर दिया गया। पश्चिम भारत की ब्राह्मण-परम्परा की गुफाओं में, इन गुफाओं को इतना महत्व भले ही नहीं दिया जाता हो लेकिन इनसे ये तो पता चलता ही है कि छठी शताब्दी में शिव संप्रदाय गोवा जैसे आधुनिक राज्य में आ चुका था।

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