गांधी जी भी आजादी के बाद
इतने हताश हो गए थे, जिसका हिसाब नहीं। क्योंकि गांधी जी का भी यही ख्याल था कि जो
हमने कहा है, वह आजादी के बाद एकदम हो जाएगा। अमन हो जाएगा, भाईचारा हो जाएगा,
शान्ति हो जाएगी, सब तरफ सुख हो जाएगा, स्वावलंबन हो जाएगा और देश सुखी हो जाएगा,
और लौट जाएगा स्वर्णयुग में, यह सब ख्याल थे। तब कमोबेश सभी नेता विरोध, संघर्ष,
सत्याग्रह मात्र से ही परिचित थे, क्योंकि आजादी के पहले यही चलन में था, इसलिए
सृजन का कार्य उनके लिए कठिन था। हम जिन नेताओं के नीचे, विगत वर्षों में जिए हैं, उनमें
से अधिकाँश के पास बहुत वैज्ञानिक सूझ-बूझ नहीं थी, सृजन की दृष्टि नहीं थी और ना
ही समाज और जीवन के वैज्ञानिक नियमों का कोई पता था। देश के नेता के पास काव्य और
भाषण की अच्छी सूझ-बूझ थी, मजबूरन इन्हीं का सहारा था। कविता भी जरूरी है, लेकिन
चटनी की तरह जरूरी है भोजन में, ज्यादा मात्रा में बन जाए, और पूरा भोजन चटनी का
ही करना पड़े तो आदमी की जान ले उड़े।
आजादी आने पर हमको पहली दफा
पता चला कि अब हमारे पास कोई रचनात्मक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक दृष्टि नहीं है, वैसे
तो प्राचीन काल में यह सब थीं और वह भी उत्कृष्ट कोटि की। अब ऐसे में नेता भी क्या
करते? सत्ताधारी नेता तब तक भाषण देना जानता था, जेल जाना जानता था, लट्ठ खाना
जानता था, धरना देना जानता था। वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया क्योंकि जो वह जानता था,
उसका सत्ता संचालन, राजकाज और सृजन से कुछ संबंध न था। जो नेता उसकी तरह सत्ता में
नहीं आ पाए, उन्होंने फिर से सत्याग्रह, धरना देना और दूसरे आंदोलन चलाना शुरू कर
दिया। हिन्दुस्तान का नेतृत्व दो हिस्सों में बंट गया था। जो सत्ताधारी हो गए, उनको कुछ पता नहीं था कि अब आगे क्या
करना है? और जो सत्ता में नहीं जा सके, उनको बिल्कुल पता था कि क्या करना है? उसने
धरने, आंदोलन का अपना वही पुराना काम जारी रखा।
सृजन की दृष्टि से वंचित
सत्ताधारी नेता के पास एक ही काम रह गया कि वह सत्ता में किस तरह बना रहे।
स्वभावतः उसके पास कोई प्लान नहीं था, क्योंकि अगर उसके पास प्लान होता तो उसे
ताकत में बने रहने की कोशिश न करनी पड़ती। अगर वह देश को सुख देता, समृद्धि देता और
भविष्य देता, तो जनता उसे सत्ता में बनाये रखती। तब उसके सामने एक ही सवाल रह गया
कि जो मैं दे सकता था, देना चाहिए था, वह दे नहीं सका हूं अतः मुझे सत्ता से हटा
दिया जाएगा, तो वह सत्ता पर पकड़ मजबूत बनाने में लग गया। तभी से देश का नेतृत्व
कुर्सी की पकड़-धकड़ में पड़ा हुआ है, उसे अब कोई और दूसरा प्रयोजन नहीं है। जो
कुर्सी के बाहर है, वह उपद्रव में लगा रहता है क्योंकि वह सत्ताधारी को हटाकर
स्वयं सत्ता की बागडोर थामने में उत्सुक है। जो कुर्सीधारी है, वह जोर से कुर्सी
को पकड़े रहता है, और उपद्रव करने वाले को तोड़ता रहता है।
