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पुण्य प्रसून बाजपेई
के इन सवालों से जो तस्वीर उभर कर सामने आती है,
वो कुछ ऎसी है:
मुनाफ़ा युक्त
व्यवस्था और जिम्मेदारी मुक्त सरकार; यही दो पटरियां आपस में तालमेल बैठाये रखती हैं। कॉर्पोरेट सेक्टर की नामचीन कंपनियों का बढ़ता मुनाफा और सरकार
की घटती जिम्मेदारी यह तालमेल साफ़ जाहिर होता है। सरकार जब अपनी जिम्मेदारियों को कम
करने की दिशा में आगे बढ़ती है तो ऐसे में प्राइवेट सेक्टर का नाम आगे आता है। जब प्राइवेट
सेक्टर का नाम आगे आता है, तो साफ़ है कि प्राइवेट सेक्टर को मुनाफा भी चाहिए और इस सेक्टर को सरकार या जनता
का दखल भी नहीं चाहिए।
जब सरकार अपनी
जिम्मेदारी कम करते हुए सिस्टम को प्राइवेट सेक्टर के हवाले करती है तो सिस्टम को दो
ही शब्दों में बयां किया जा सकता है- प्रॉफिट और टैक्स। यही वो कारण है, जिसके चलते देश में बनने वाली बहुत सी जन-आवश्यक वस्तुएं और
दवाएं को भी अधिक लाभ के विदेश भेजा जाता है। संविधान के द्वारा जनता को अधिकाधिक अधिकार
दिए गए हैं; जैसे
शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, रोजगार का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, स्वथ्य पर्यावरण और वातावरण का अधिकार आदि।
अब सवाल यह
है कि इस देश में सिस्टम कौन संभाले हुए है। देश में 75% रोजगार प्राइवेट सेक्टर के हाथों में है। देश में हेल्थ के सिस्टम के ढाँचे
का 72% प्राइवेट सेक्टर संभाले हुए है। सरकार शिक्षा,
स्वास्थ्य और रोजगार की जिम्मेदारी से साफ़ तौर पर खुद को बचते हुए नज़र
आती है। जैसे ही हम हायर एजुकेशन की ओर देखते हैं, प्राइवेट कॉलेज,
यूनिवर्सिटी ही दिखाई देते हैं, अर्थात जिसके पास
पैसे होंगे, उसे ही उच्च शिक्षा मिल सकेगी। जनता की हालत तो वैसे
ही बहुत नाज़ुक है, उसके पास तो एम्बुलेंस के लिए देने तक तो पैसे
नहीं हैं। सरकार तो एम्बुलेंस देने की जिम्मेदारी भी निरंतर कम करती जा रही है।
अगर एक फेहरिस्त
देखें तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार प्राइवेट सेक्टर के हाथों में है, इंश्योरेंस में भी प्राइवेट सेक्टर
का हिस्सा बढ़ता ही जा रहा है। आयुष्मान भारत योजना की स्थिति तो सबको पता ही है। सड़क परिवहन
तो लगभग पूरा ही प्राइवेट सेक्टर के पास है। रेल परिवहन के निजीकरण की दिशा में सरकार
तेजी से आगे बढ़ रही है। अधिकांश समुद्री बंदरगाह निजी हाथों को सौंपे जा चुके हैं।
हवाई अड्डों को भी प्राइवेट सेक्टर के हाथों सौंपने का काम चल रहा है। मिड-डे मील याने
मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था भी अप्रत्यक्ष रूप से कमोबेश निजी सेक्टर के पास है। जिम्मेदारी
मुक्त सरकार और मुनाफा युक्त प्राइवेट सेक्टर का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता
है कि महामारी के जिस दौर में दवा और इंजेक्शन की किल्लत रही,
उसी दौर में इन्हीं का निर्यात अधिकाधिक हुआ।
