एक जमाना था जब भारत कृषि प्रधान देश कहलाता था। आजकल प्रजातंत्र के आशीर्वाद से राजनीति प्रधान देश के नाम से दुनिया में पहचाना जाता है! हमारे पूर्वजों को अनपढ़ गवार की संज्ञा दी जाती थी लेकिन उनके वंशज आज राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ी ही नहीं विश्व गुरु हैं? बेचारे हमारे बुजुर्गों को राजनीति सीखने-समझने के वास्ते कई विदेशी धरती की ख़ाक छाननी पड़ी और पापड़ बेलने पड़े। तब जाकर भारत की धरती पर पैर जमे। वक्त की नज़ाकत देखो, आजकल विश्व के अनेक देशों के लोग भारत की धरती पर आकर न केवल राजनीति सीखते और करते हैं अपितु कुछ लोग तो राजनीतिक गुरु बनने लगे हैं। यही कारण है कि मूलवासी की राजनीति क्षेत्रीय हो गई है। देसी राजनीतिज्ञों के हाल ठीक वैसे ही हो गए, जैसे आजादी के बाद देसी राजे- रजवाड़े हो गए थे। बेचारे देसी राजनीतिक तीन-चार सीटों पर समझौता कर सलाहकार बनते हैं। जनता के आशीर्वाद से एक-दो सीट झोली में गिर गई तो सत्ता की भागीदारी का सौदा करते हैं! पद मिला तो ठीक, वरना पीछे की कुर्सी पर बैठे-बैठे खिसियानी बिल्ली की तरह खंबा नोचते रहते हैं।
विदेशी शब्द का दुर्भाग्य देखिए कि जब भी राजनीति के संदर्भ
में इसका प्रयोग होता है तो समूचे बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान एक ही खानदान के
इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है? यह सरासर 'अतिथि देवो भव:' संस्कार का तिरस्कार है। भारतीय सनातन परंपरा का घोर अपमान
है। अपमान है उस जयचंद का, जिसने अपनी ही बेटी संयोगिता को नीचा दिखाने तथा दामाद पृथ्वीराज को मौत के
घाट उतारने की खातिर मोहम्मद गोरी का साथ दिया था! धन्य है वे राजा-रजवाड़े,
जिन्होंने
चन्द सिक्कों के खातिर अंग्रेजों
के स्वागत में पलक पावडे बिछाए थे। भारत में एक परिवार नहीं,
हजारों ऐसे राजनीतिक परिवार हैं, जिनका घर तो भारत में है लेकिन जड़े विदेशी
धरती पर जमी हुई हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या? चलो किसी भी दल के नेता के घर जाकर देख लो। तुम्हें उनके
स्वागत कक्ष में विदेशी नेताओं की तस्वीर और विदेशी संस्कार मिल जाएंगे। कुछ नहीं
तो विदेशी शिक्षा की पैरवी जरूर मिलेगी। यदि दुर्भाग्य से कुछ नहीं मिला तो कम से
कम विदेशी बैंकों में जमा धन की पर्ची जरूर मिलेगी? हंसमुख के इस दावे का गलत साबित होने का अर्थ है- भारत में भारतीयों की भारतीय राजनीति में
जड़ें जम रही है।
इधर भाईजान,
आजकल कार्यपालिका,
न्यायपालिका और
व्यवस्थापिका में अंग्रेजी खूब जमी हुई है! जिसको फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं आती, वह अभी भी गुलाम है?
जो नेता अंग्रेजी नहीं बोलता है, वह मंत्री बनने योग्य नहीं समझा जाता?
हिंदी बोलने का अर्थ है- गांव का गंवार! मातृभाषा और भारतीयता के संवाहक बनकर घूमने का अर्थ है-
असभ्य! बाप रे बाप! भारत में भारतीय होने की इतनी घिनौनी सजा तो
मुगलों और अंग्रेजों से नहीं मिली, उतनी सजा तथाकथित
पढ़े-लिखे भारतीय दे रहे हैं? बिचारे हिंदी बोलने वाले सासंद-विधायक सदन में ऐसे बैठे
रहते हैं, जैसे मंदिर में मूर्ति! अंग्रेजी का चलन
जितना अंग्रेजी शासन काल में नहीं रहा, उतना 70 साल से सारा कामकाज अंग्रेजी में ऐसे चल रहा है, जैसे वही हमारी मातृभाषा-राष्ट्र भाषा हो।
शासन व्यवस्था के तीनों अंग आज भी राजभाषा और राष्ट्रभाषा की शब्द ध्वनि सुनने के
लिए ऐसे तरस रहे हैं, जैसे जेष्ठ माह में पानी के लिए तरसते
पशु- पक्षी!!
भारत में कभी सौहार्दता- सहिष्णुता भाव की गंगा बहा करती
थी। पड़ोसी धर्म निभाने
की परंपरा भी थी। आजकल प्रजातंत्र में इस तरह के गुणों से सराबोर व्यक्ति को कोई
नहीं पूछता? चूंकि
भारत एक राजनीतिक देश बन गया है, इसलिए राजनीति में सहिष्णुता, सौहार्दता और भाईचारे जैसे मानवीय मूल्यों का पालन होगा, तो विपक्ष धराशाई हो जाएगा! विपक्ष नष्ट
होने का अर्थ होगा- प्रजातंत्र का बंटाधार!! सहिष्णुता धर्म
निभाने का अर्थ होगा- गई भैंस पानी में! अरे भाई सरकार पर
लगाम कसने के लिए सक्षम विपक्ष का होना अनिवार्य
है। यदि विपक्ष सहिष्णुता की चादर ओढ़ कर एक थाली में खाने लगेगा तो सत्ता
पक्ष की चारों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में। सबका साथ और सबका विकास हो सके
और किसी को भी कष्ट और संकट का सामना नहीं करना पड़े,
यह हम जागरूक भारतीय मतदाता कभी होने नहीं देंगे!!
रही बात पड़ोसी धर्म निभाने की?
अरे किस पड़ोसी की
बात कर रहे हैं जनाब!
पड़ोसी देश का हो या घर का, दोनों ही आस्तीन का सांप बने हुए हैं। एक पड़ोसी देश कहलाने को तो पाक है
लेकिन इरादे हमेशा नापाक रखता है! एक चीनी है लेकिन जीभ पर हमेशा कड़वाहट घोले
रखता है। बांग्लादेश भी मुख में राम बगल में छुरी रखता है। म्यानमार रहता तो म्यान
के भीतर,
पर कभी भारतीयों का भला नहीं चाहता। अफगान अफवाहों में बहकर
बेजान मूर्तियों को तोड़ता रहता है! नेपाल भी अब सच्चा पड़ोसी नहीं रहा। इधर घर का
पड़ोसी भी 'घर
का भेदी लंका ढाए' कहावत को चरितार्थ करते हुए आयकर विभाग का छापा डलवाकर पड़ोसी धर्म निभाने में
मशगूल है। क्या करें !बड़ी मुश्किल है भारतीय बने रहना?
एक तरफ खाई दूसरी तरफ कुआं। भारतीयता का राग अलापने में रहे
और अंग्रेजी नहीं सीखे, तो
उच्च नौकरी और छोकरी से वंचित! सादा जीवन जीने के चक्कर में पैदल चलना पड़ता है और
सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने में तलवे घिस जाते हैं। सादा जीवन उच्च विचार का 'भ्रष्टाचार' बाजार में भाव सबसे नीचा है! बस गीता ज्ञान का ज्ञानी
हंसमुख जैसा रह-रह कर भारतीयता का रेट लगाना सीखे तो समझो
कोल्हू का बैल!! चमड़ी भी घिसेगी और दुनिया का सुख भी नहीं मिलेगा?
अतः खिदमत में अर्ज़ है:
विदेशी धुन लगी समझो हो गए मालामाल ।
भारतीयता की धुन लगी समझो हुए कंगाल ।।
