मोदी सरकार के 7 साल पूरे होने पर प्रख्यात
जर्नलिस्ट पुण्य प्रसून बाजपेई ने ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब पर वीडियो
शेयर करते हुए जो सवाल खड़े किये हैं, उन पर गौर करना लाज़िमी है।
बाजपेयी कहते हैं- जब 26 मई 2014 को
जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, राष्ट्रपति भवन का वो नज़ारा वाकई अद्भुत था। तब से अब तक सभी ने एकाधिकार की प्रवृत्ति
से लेकर सरकारी तंत्र को बेबस बनाने का दृश्य देखा होगा। भारत के 70 वर्षों के इन
7 वर्षों में नरेंद्र मोदी ने ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जो भुलाये नहीं भूलेगा। भले इसे स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया जाए, कहीं न कहीं ये दाग की तरह नज़र आएगा। बेरोजगारी का मामला हो, बैंकों की बात हो, प्रचार-प्रसार पर
किया गया अंधाधुंध खर्च हो या प्रवासी मजदूरों की हालत हो, सब कुछ साफ़ नज़र आता है कि कहा था क्या, और किया क्या? ब्लैक मनी का मामला
भी अता-पता-लापता हो चला है।
https://twitter.com/ppbajpai?lang=en
https://www.facebook.com/ppbajpai.official/
https://www.youtube.com/watch?v=3Bn-cBABox0
पुण्य प्रसून बाजपेई आगे कहते हैं-
सरकार के 7 बरस अर्थात 2,555 दिनों के सफर में मोदी ने कितना सफर किया। इन्होंने 470 दिन देश के भीतर यात्राओं में, 212 दिन विदेश यात्राओं में गुजारे। इस
तरह से इन्होंने कुल 2,555 दिनों में से
682 दिन यात्राओं में गुजारे अर्थात हर 3 दिन और 7 घंटे के बाद प्रधानमंत्री यात्रा
पर निकल जाते थे। इस दौरान प्रचार-प्रसार पर
7,658 करोड़ रूपये यानी हर दिन 3 करोड़ रूपये खर्च किये गए। 6 बरस के आंकड़ों
के अनुसार सरकारी बैंकों से औसतन प्रतिदिन 878 करोड़ रूपये के लोन दिए जाते रहे।
वहीं भारत सरकार द्वारा औसतन प्रतिदिन 312 करोड़ का लोन रिटन-ऑफ़ यानी माफ़ किया जाता
रहा। सरकारी के साथ दिगर बैंकों को मिला लिया जाए तो 18,34,690 करोड़ रूपये के लोन दिए गए और भारत सरकार द्वारा 8,78,000 करोड़ रूपये के लोन माफ़ कर दिए गए। और इस तरह से बैंकों के एनपीए का औसत
9.5% हो गया, जो अन्य देशों की
तुलना में कई गुना अधिक है। भारत सरकार ने इसी
अवधि में आरबीआई से 5,44,732 करोड़ रूपये लिए। देश की पब्लिक सेक्टर कंपनियों का मामला तो सबके सामने है
ही, 19 कंपनियों के डिसइनवेस्टमेंट आदि के द्वारा सरकार ने 3,29,917 करोड़ रूपये प्राप्त किये। यानी इन आंकड़ों से सब समझ सकते हैं कि पैसा आया
कहाँ से और गया कहाँ। गौरतलब है इन्हीं सालों में मोदी सरकार द्वारा पूर्ववर्ती
सरकारों की तुलना में बहुत कम रोजगार दिया गया।
