मोदी सरकार के 7 साल


इन 7 सालों में आम आदमी की जेब हल्की हुई। करोड़ों मध्यमवर्ग के लोग ग़रीब वर्ग में शामिल होने को विवश हुए। अमीर और अमीर हुए, जबकि ग़रीब और ग़रीब।

 

नोटबंदी के बाद उल्टा घूमने लगा पहिया

नरेंद्र मोदी के शासनकाल के शुरुआती दो साल में आर्थिक विकास दर सकारात्मक रही, लेकिन बाद के वर्षों में यह लगातार गिरती चली गयी। 2014 में आर्थिक विकास दर 7.4 प्रतिशत थी जो 2016 में बढ़कर 8.25 प्रतिशत हो गयी। लेकिन, नोटबंदी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था का चक्का उल्टा घूमने लगा। आर्थिक विकास दर में लगातार गिरावट जारी है और यह 2018 में 7.04%, 2019 में 6.11% और 2020 में 4.18% के स्तर पर लुढ़क चुकी है।

 

प्रति व्यक्ति जीडीपी में भारत

जीडीपी के आकार के मामले में भारत 2014 में 10वें नंबर पर था और अब इससे आगे बढ़कर छठे नंबर पहुँच चुका है। मगर, प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत 147वें स्थान पर है। इसका मतलब यह है कि आम भारतीय पहले से अधिक ग़रीब हुए हैं। भारत की रैंकिंग 22 स्थान नीचे लुढ़क गयी है।

 

भुखमरी की ओर बढ़ा देश

किसी देश की स्थिति का आकलन जिन आधारों पर होता है, उनमें अहम है- भुखमरी का सूचकांक, जिसे ग्लोबल हंगर इंडेक्स कहते हैं। 2014 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान 76 देशों के बीच 55वाँ था। 2020 में 107 देशों के बीच भारत का स्थान 94वाँ हो गया। एक साल बाद 2021 में इसमें और गिरावट आ गयी है। 2021 में 117 देशों के बीच भारत 102वें स्थान पर पहुँच चुका है।

 

मानव विकास सूचकांक में भारत

किसी देश की सेहत को समझने के लिए एक अन्य पैमाना मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई का होता है। इस पैमाने पर भारत वर्ष 2021 में 189 देशों के बीच 131वें स्थान पर है। 

 

7 साल में दोगुना हुआ देश पर कर्ज

भारत पर राष्ट्रीय कर्ज आज 2.62 ट्रिलियन डॉलर है (स्रोत- statista.com)। यह आँकड़ा भारत की जीडीपी (2.7 ट्रिलियन डॉलर) के लगभग बराबर पहुँच चुका है। 2015 में यही कर्ज 1.28 ट्रिलियन डॉलर था। इसका मतलब साफ़ है कि जिस गति से क़र्ज़ में बढ़ोतरी हुई है, वह जीडीपी में बढ़ोतरी से कहीं अधिक तेज़ है। जीडीपी और क़र्ज़ का अनुपात 89.56 हो चुका है।

 

कमजोर होता गया रुपया

डॉलर के मुकाबले रुपया बीते सात साल में 13.11 रुपये कमजोर हुआ है। 2014 में एक डॉलर की कीमत 62.33 रुपये थी, आज यह 75.44 रुपये है। मुद्रा के कमजोर होने का मतलब है कि विदेश से लिया हुआ लोन महंगा हो जाता है।

 

बढ़ने के बजाए घट गया निर्यात

किसी देश की व्यापारिक सेहत को जानने के लिए उसके आयात-निर्यात और व्यापार संतुलन को देखा जाता है। 2014 में भारत का निर्यात कुल 317.545 अरब डॉलर का था। यह आगे बढ़ने के बजाए घटने लगा। 2020 में यह नीचे घटकर 275 अरब डॉलर का हो गया। 2019 के मुकाबले 2020 में अकेले एक साल में 14.7 प्रतिशत की गिरावट आयी।

 

दोगुनी हुई बेरोज़गारी की दर

जब नरेंद्र मोदी ने देश की शासन व्यवस्था की बागडोर संभाली थी, तब 2014 में भारत में बेरोज़गारी की दर 5.61 प्रतिशत थी। 2019 में इसमें मामूली सुधार हुआ और यह 5.36 प्रतिशत पर पहुँच गयी। लेकिन, उसके बाद स्थिति बिगड़ती चली गयी। 2020 और 2021 में बेरोजगारी का प्रतिशत दोहरे अंक को पार कर चुका है। मतलब यह कि बेरोज़गारी के मामले में जो स्थिति 2014 में थी, 2021 में उससे दोगुनी हो चुकी है।

 

21.93 रुपये महंगा हुआ पेट्रोल

पेट्रोल की कीमत में 21.93 रुपये प्रति लीटर का उछाल बीते 7 साल में देखने को मिला है। डीजल में यह उछाल 27.04 रुपये प्रति लीटर का है। पेट्रोल-डीजल की मार जनता पर तब पड़ी है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार घटती गयी है। मई 2014 में कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 106.85 डॉलर प्रति बैरल था, जबकि आज यह 68.32 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर है।

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