कुछ बुनियादी सवाल, सामने है कोरोना से लड़ाई, ऊपर से कमर तोड़ महंगाई

 


निःसंदेह कोरोना वर्ष 2020 की शुरुआत से ही सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था बिगड़ी है। इससे हमारा देश भी अछूता नहीं रहा है। समय-समय पर इस महामारी के अनियंत्रित होने और दूसरी लहर के चलने से केंद्र और राज्य सरकारों का अर्थ संतुलन बिगड़ गया है। एंटीजन टेस्ट, आर टी पी सी आर टेस्ट, पी पी ई किट, हॉस्पिटल बेड, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर्स, दवा, इंजेक्शन और वैक्सीन के मद में अधिक राशि की आवश्यकता बनी रहनी है। अदूरदृष्टि और राजनैतिक और प्रशासनिक कुशलता तथा तालमेल के अभाव में अव्यवस्थित तरीके से ही सही, पर इस दिशा में काम हो रहा है, जो और भी बेहतर तरीके से किया जा सकता है। वर्तमान मैनेजमेंट सिस्टम में नेता, अधिकारी और वैज्ञानिक तो हैं, पर विद्वान और विचारक नदारद हैं, क्या इस बात पर गौर करना जरूरी नहीं है?

 

इस तथ्य से हर सरकार भलीभांति परिचित है कि विशेषकर जीवनरक्षक दवा और इंजेक्शन की पूर्ति की तुलना में मांग अधिक होने पर न केवल मरीज के परिजनों को यहां वहां भटकना पड़ता है, बल्कि इनकी कालाबाजारी के साथ नकली दवा और इंजेक्शन का व्यापार फलने-फूलने लगता है। तो क्या इसकी रोकथाम के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाये जाने चाहिये?

 

पौराणिक काल के कुछ पात्र ऐसे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे अजर-अमर हैं, उन्हें रोग और मृत्यु छू तक नहीं सकते हैं। हम में से कुछ लोगों को भी यही लगता है। और ऐसे लोग मास्क लगाना, दूरी बनाये रखना, हैंडवाश करना जैसे सामान्य पर असरकारी उपायों को अपनाना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। हो सकता है कि इनके अंदर प्राकृतिक रूप से अतिरिक्त प्रतिरोधक शक्ति भी हो, लेकिन इन्हें देखकर सामान्य लोग भी इनके अनुरूप आचरण करने लगते हैं। ये तब तक नहीं मानते जब तक संक्रमण की चपेट में खुद नहीं आ जाते, लेकिन इससे पहले ये लोग संक्रमण का पर्याप्त प्रसार कर चुके होते हैं। क्या ऐसे लोगों को समाज में स्थान और सम्मान दिया जाना चाहिये?

 

अब जरा अपनी निगाह बढ़ती महंगाई पर डालें। करीब डेढ़ साल में जरूरत की हर चीज की कीमतें डेढ़ गुनी हो चुकी हैं। हर लॉकडाउन मुनाफाखोरों, जमाखोरों, भ्रष्ट तंत्र के लिए सुनहरा अवसर बन कर सामने आता है। इस पर भी यह जरूरी नहीं कि ऊंचे दामों पर भी आपको वांछित गुणवत्ता या ब्रांड का सामान मिले या फिर हो सकता है कि सामान ही ना मिले। ना चाहते हुए भी इन्हीं जरूरतमंद को यहां-वहां घूमना भटकना पड़ता है, जिससे लॉकडाउन का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। क्या सरकार को जरूरतमंदों को घर पर या पास में ही सामान उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं करनी चाहिये?

 

अब कुछ भूतपूर्व रिकॉर्डेड फोन कॉल्स और मैसेजेज को याद करें:

1. हम आपके लिये, समाज के लिये, देश के लिये कुछ करना चाहते हैं। हमें एक बार मौका दें। हम हमेशा आपसे एक फोन कॉल की दूरी पर मौजूद रहेंगे, हर मदद के लिये। संकट के समय अब वो फोन कॉल्स कहाँ हैं?

2. होली, दिवाली, नये साल और बहुत से पर्वों पर आने वाले वो लुभावने मैसेज- जो बताते थे कि इन मैसेज को भेजने वाले नेताजी, पदाधिकारी आपके सबसे बड़े शुभचिंतक हैं। क्या अभी भी आपके हालचाल जानने ये लोग कोई मैसेज भेज रहे हैं या फोन कॉल्स कर रहे हैं?

3. क्या शहर, क्या गाँव, चुनाव के समय तो हर प्रत्याशी और पार्टी का कार्यकर्ता 2-4 बार तो मतदाता तक चिरौरी-मिन्नत करने पहुँच ही जाता है। क्या किसी भी पार्टी के, नेता, वर्तमान तो छोड़िये पूर्व पार्षद, विधायक, मंत्री, ग्राम प्रधान, जिला प्रधान, राज्य प्रधान आदि, इनमें से किसी ने भी कोई मैसेज भेजा या फोन किया है कि वो 24 घण्टे आपकी किसी समस्या या आपात स्थिति में मदद के लिये उपलब्ध हैं। आपको ऐसा कोई मैसेज या फोन कॉल मिला क्या?

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