सब पर पड़ी कोरोना की मार

- मनोज श्रीवास्तव
ईमेल: manojshriv@gmail.com


कोरोना महामारी ने इस बार अमीरों को भी डसा है। कोविड ने अमीरों को ज्यादा बीमार किया है, जो वायरस से मुकाबला करना नहीं जानते। जो पहले से गंदे मकानों, गंदी सडक़ों, गंदे पाखानों, गंदे कपड़ों के के लिए मजबूर हैं, उन्हें यह रोग या तो पकड़ नहीं पाया या फिर बिना पहचान कराए वे बिमार पड़े, मरे या ठीक हो गए, पर अस्पताल नहीं गए, सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हुए। यह न भूलें कि कोविड ने देश को 10-15 साल पीछे धकेल दिया है। सरकार चाहे टैक्स ज्यादा वसूल ले, पर आम जनता गरीब हो गई है, गरीब और भी गरीब हो गया है। मध्यम वर्ग का मासिक बजट महंगाई से लड़ाई में हारता हुआ दिख रहा है।

 

कोविड ने गरीबों को बीमारी से कहां ज्यादा बेकारी से मारा है। पिछले मार्च-अप्रैल 2020 में जब कारखाने बंद हुए और इस बार फिर जब दोबारा बंद होने लगे, तो लाखों की नौकरियां या धंधे चौपट हो गए। फर्क तो अमीरों को भी पड़ा है, जिन की बचत खत्म हो गई, पर वे सह सकते थे। उन्हें भी दर्द झेलना पड़ा, क्योंकि वे इस के आदी नहीं थे। राजनीति के लिए, सत्ता के लिए, चुनाव के लिए अर्थ बैंक और वोट बैंक महत्वपूर्ण होता है, इस लिहाज से मध्यम वर्ग कहीं फिट नहीं बैठता है, सो उनको अपनी नियति खुद भुगतनी है।

 

गांवों कस्बों में स्कूलों का इस्तेमाल अस्पतालों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। और जो भी दवा मिल रही है, वह ले कर बचने की कोशिश हो रही है। यह पक्का है कि सरकार ने जिस हल्के तरीके से इस बीमारी का गरीब और माध्यम वर्ग पर पड़ने वाले असर को लिया है, वह बेहद खलता है। हर गांव कस्बे में एंबूलेंस और अस्पताल होने चाहिए, चाहे केंद्र सरकार के हों, राज्य सरकार के या पंचायत के। जब हर जगह थाने बन सकते हैं तो अस्पताल क्यों नहीं।

 

केंद्र सरकार ने वैक्सीन निर्माताओं को पहले क्या सोचकर ऑर्डर दिए थे, यह नहीं मालूम, मगर उसके जो भी पूर्वानुमान थे, इस दूसरी लहर ने उसे तहस-नहस कर दिया है। अचानक संक्रमण के बढ़ने से लोग डर गए और टीका लगवाने दौड़ पड़े। बढ़ते दबाव में सरकार ने 18 से 44 की उम्र के लोगों को भी टीका लगाने की घोषणा कर दी, जबकि इसके लिए जमीनी तैयारी नहीं थी। नतीजतन, एक किस्म की अफरातफरी का माहौल बन गया है। ऐसे में, सरकार को चाहिए कि वह स्थिति का सही आकलन करे और उसके मुताबिक जनता को सही स्थिति बताते हुए टीकाकरण की योजना बनाए। यदि ऐसा न हुआ, तो अनिश्चय, अराजकता और संदेह का माहौल स्थिति को और खराब करेगा। इससे बचने की जरूरत है।

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