इस हिंदी उपन्यास ने दुनिया को सिखाया था जादू और तिलिस्म!

-मनीष सोनी, क्यूब मीडिया एंटरटेनमेंट प्रा. लि., ईमेल: manishbrajsoni@gmail.com

 

लेखिका जे. के. रॉलिंग की उपन्यास सीरीज, ‘हैरी पॉटर’और इस पर आधारित जादू और रोमांच से भरी फिल्म सीरीज के बारे में कौन नहीं जानता। स्कूल के बच्चों को इस सीरीज के किरदार, उनके नाम, और तो और डायलॉग तक याद होते हैं। 1977 में हैरी पॉटर की पहली किताब प्रकाशित हुई थी और 2001 में फिल्म सीरीज का पहला भाग रिलीज़ हुआ। लेकिन ‘हैरी पॉटर’से भी 85 साल पहले हिंदी के एक उपन्यास ने भारतीयों को जादू और तिलिस्म से रू-ब-रू कराया था। सिर्फ इतना ही नहीं, इस उपन्यास पर आधारित एक टेलीविज़न धारावाहिक भी बना है। यह उपन्यास था ‘चंद्रकांता,’ जिसे बाबू देवकीनंदन खत्री (1861-1913) ने वर्ष 1892 में लिखा था। इस उपन्यास की तिलिस्मी दुनिया और इसमें होने वाले तरह-तरह के जादू, किसी भी तरह से ‘हैरी पॉटर’से कम नहीं हैं।


आज की पीढ़ी को शायद ही इस महान उपन्यास और धारावाहिक के बारे में पता हो। पठनीयता की सबसे बड़ी ताकत का तात्पर्य, पाठक का किसी रचना के साथ आरम्भ से लेकर अंत तक गहरा सम्बन्ध स्थापित हो जाने से है। चन्द्रकान्ता संतति एक ऐसा ही उपन्यास है। एक ऐय्यारी उपन्यास के रूप में प्रसिद्ध यह उपन्यास घटना प्रधान, तिलिस्म, जादूगरी, रहस्यलोक तथा ऐय्यारी की पृष्ठभूमि पर संजोया गया है।

 

मनोरंजन से भरपूर और रोमांचक होने के साथ, और भी बहुत सी वजहें हैं, जो आज भी ‘चंद्रकांता’ उपन्यास को सबसे अलग बनाती हैं। आज हम जिस स्वरूप में हिंदी को बोलते, पढ़ते और समझते हैं, उसकी शुरुआत ‘चंद्रकांता’से हुई। चंद्रकांता को हिंदी का पहला सबसे ज्यादा बिकने वाला उपन्यास माना जाता है। हिंदी साहित्य के मशहूर इतिहासकार, रामचंद्र शुक्ल के मुताबिक, इस उपन्यास की वजह से आम लोगों ने हिंदी भाषा की किताबें पढ़नी शुरू कीं। शायद कोई यकीन न करे, लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत में और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के गैर-हिंदी भाषी प्रान्तों में भी लोगों ने हिंदी पढ़ना सीखा, क्योंकि वे इस उपन्यास को पढ़ना चाहते थे।

 

जिस जमाने में बाबू देवकीनंदन खत्री ने अपनी लेखनी शुरू की, तब जादुई, काल्पनिक कहानियां पारसी या फिर उर्दू भाषा में लिखी जाती थीं। हिंदी अर्थात देवनागरी लिपि का प्रयोग उस समय बहुत ही शुद्ध मानक भाषा के रूप में किया जाता था। लेकिन बाबू देवकीनंदन खत्री ने भाषा के नियमों की सीमा से बाहर निकलकर अपने उपन्यास में आम बोलचाल की भाषा को जगह दी। उन्होंने चंद्रकांता को चार भागों में लिखा, जिनमें हर एक अध्याय को ‘बयान’कहा गया है। उन्होंने साल 1888 से 1891 के बीच इसे एक-एक अध्याय करके सीरीज़ के तौर पर प्रकाशित किया। उनके ये अध्याय इतने मशहूर हो गए कि लोग बेसब्री से अगले अध्याय का इंतज़ार करते थे। बहुत-से लोग उस समय हिंदी अर्थात देवनागरी लिपि पढ़ना नहीं जानते थे और इसलिए जिसे हिंदी पढ़ना आता था, वह तेज आवाज़ में बाकी सबको पढ़कर सुनाता था। इसके अलावा, बहुत से लोगों ने हिंदी पढ़ना सीखा। भारत में हिंदी पाठकों की संख्या बढ़ाने का सबसे ज्यादा श्रेय बाबू देवकीनंदन खत्री को जाता है।

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