1969 का साल कई मायनों में असाधारण था। हिंदी फिल्म उद्योग ने राजेश खन्ना के आगमन को ‘‘इत्तेफाक‘‘ और ‘‘आराधना‘‘ के साथ देखा। इन फिल्मों ने सुनामी की तरह बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया। अपोलो चंद्रयान मिशन के जरिये इंसान चाँद की तरफ बढ़ रहा था। ‘‘लेट द सनशाइन इन‘‘ नामक अमरीकी गीत और संगीत युवाओं को अपनी ओर खींच रहा था। क्रिकेट कप्तान मंसूर अली खान पटौदी टीम के पिछले कमजोर प्रदर्शनों के कारण मुख्य चयनकर्ता विजय मर्चेंट के दबाव में थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं थीं, वह अन्य दलों के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर की प्रतिद्वंद्विता से लड़ रही थीं। 19 जुलाई, 1969 को, गांधी ने सार्वजनिक समर्थन जुटाने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिससे व्यापार और राजनीतिक हलकों में हाहाकार मच गया, ऐसा उनकी अपनी पार्टी में भी हुआ। 12 नवंबर, 1969 को, उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। इंदिरा ने कांग्रेस के दो टुकड़े कर दिए। इंदिरा की पार्टी का नाम रखा गया कांग्रेस ;त्द्ध और दूसरी पार्टी हो गई कांग्रेस ;व्द्ध। 1969 तक, मुंबई शहर में राजनीति ने कुछ तीखे मोड़ ले लिए। कार्टूनिस्ट बाला साहेब ठाकरे की पार्टी शिवसेना मजबूत होने लगी। फायरब्रांड समाजवादी जॉर्ज फर्नांडीस दक्षिण मुंबई सीट पर कांग्रेस के एसके पाटिल को झटका दे कर स्थापित हो चुके थे।
इसी दौर में एक दिन, 21 मई, 1969 की सुबह झाँसी से मुंबई वीटी रेलवे स्टेशन पहुंची ट्रेन से सुबह लगभग 11.30 बजे एक 21 साल का नौजवान उतरता है। प्री-मानसून तूफानी बारिश होते हुए भी वो एक गीत गुनगुना रहा है - ‘‘मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया‘‘। स्टेशन के पास ही एक डॉरमेटरी होटल में अपना सामान रखकर वो सीधे देव आनंद, विजय आनंद के सांताक्रूज स्थित ऑफिस ‘नवकेतन‘ पहुंचता है। पूछने पर पता चलता है कि अभी देव साहब नहीं आये हैं, बारिश के कारण पूरी तरह से भीगने और कीचड़ से सने पैरों के कारण वह नौजवान इंतजार करने की बजाय वापस चला जाता है।
अगले कुछ दिनों में काफी तलाश के बाद उस नौजवान को वकोला में 70 रुपये महीने के भाड़े पर रहने के लिए एक कमरा मिल जाता है। देव साहब के लिए चाहत और उनसे मिलने की हसरत उस नौजवान को चैन से बैठने नहीं देती हैं। उसे एक नाम याद आता है - सुरेंद्र पाल, जो जुहू होटल में मैनेजर थे। वो सीधे जुहू होटल जा कर, उनसे मिलकर देव साहब से मिलने की ख्वाइश बताता है। सुरेंद्र पाल कहते हैं- देव साहब से मिलना कोई हँसी- मजाक है क्या। जूनून तो जूनून होता है, नौजवान को अपने स्कूल मित्र के बड़े भाई प्रेमप्रकाश का नाम याद आता है, जो देव साहब के छोटे भाई विजय आनंद याने ‘गोल्डी’ के असिस्टेंट थे। उसे अँधेरे में प्रेमप्रकाश नाम की किरण दिखाई देती है। नौजवान उनसे मिलने नवकेतन के ऑफिस के कई दिन तक चक्कर लगाता है, फोन करता है, प्रेमप्रकाश नहीं मिलते हैं। टेलीफोन ऑपरेटर हर बार रटा रटाया जवाब देती है- ‘‘प्रेमप्रकाश जी नहीं हैं, आने पर बता दूंगी‘‘। अंत में जा कर वह नौजवान एक दिन फोन लगाकर टेलीफोन ऑपरेटर से कहता है- मेरा नाम राम मिश्रा है, मैं प्रेमप्रकाश जी के गाँव से आया हूँ, तब जा कर उसकी बात प्रेमप्रकाश से होती है। प्रेमप्रकाश उसे 2-3 दिन बाद अपने गेस्ट हॉउस के कमरे में आ कर मिलने को कहते हैं।
1969 के दौर में जहां 1 पैसे का सिक्का चलन में था, वहीं 10000 रूपये का नोट भी। तब मुंबई की आबादी लगभग 45 लाख थी। मार्च 1964 में बंद हो चुकी ट्राम की पटरियां सड़कों पर मौजूद थीं। टैक्सी के तौर पर बेबी हिंदुस्तान, ऑस्टिन, एम्बेसेडर जैसी कारें चलन में थीं, वहीं शेवरलेट कंपनी की शानदार इम्पाला का क्रेज बड़े लोगों और फिल्म स्टार्स में था। फिल्मों में यही इम्पाला कार पहली बार एम एम चिनप्पा देवर की फिल्म ‘‘हाथी मेरे साथी‘‘ (1971) में नजर आई। उस दौर में मुंबई की सड़कों पर पूरे दिन में गिनी चुनी 8-10 ऐसी बड़ी कारें देखने को मिलती थीं। ठम्ैज् की डबल डेकर लोकल यात्री बस चलन में थीं, साथ ही टाँगे और बग्घियां भी चलती थीं। मुम्बई की पहचान इस डबल डेकर बस को बासु चटर्जी की फिल्म ‘मंजिल‘ (1979) के एक गीत ‘‘रिमझिम गिरे सावन‘‘ में अमिताभ, मौसमी चटर्जी के अभिनय, किशोर दा और लता दीदी के गायन तथा पंचम के संगीत के साथ देखा जा सकता है। लोकल बस का टिकट 5 पैसे, 10 पैसे में मिलता था, कोलाबा में बहुत शानदार रेडीमेड शर्ट 22 रूपये 50 पैसे की मिलती थी।
वो नौजवान याने राम मिश्रा 2-3 दिन बाद प्रेमप्रकाश से मिलने गेस्ट हॉउस के कमरे के बाहर दस्तक देता है। प्रेमप्रकाश उसका परिचय पूछकर अंदर आ कर बैठने को कहते हैं और फिर बिना कुछ कहे बिस्तर पर लेट कर झपकी लेने लगते हैं, काफी टाइम निकल जाता है, इस दौरान वो एक दो बार करवट बदलते हैं, पर कुछ बोलते नहीं हैं। और फिर प्रेमप्रकाश करवट बदलकर पूछते हैं - मुंबई क्यों आये हो? तब राम मिश्रा उनसे सधी हुई फर्राटेदार अंग्रेजी में कहते हैं दृ श्प् िलवन चसमंेम चंल सपजजसम ंजजमदजपवदए जीमद प् ूपसस जमसस लवन जीम मदजपतम ेजवतलश् इतना सुनते ही प्रेमप्रकाश आश्चर्य और प्रशंसा के भाव के साथ तुरंत बिस्तर से उठ बैठते हैं और राम मिश्रा से कहते हैं -‘‘वाह ! एक तो अंग्रेजी, और वो भी स्टाइलिश!‘‘ फिर प्रेमप्रकाश और राम मिश्रा के बीच बातचीत का दौर चलता है। राम मिश्रा अपने स्कूल के सहपाठी जो प्रेमप्रकाश के छोटे भाई थे का जिक्र करते हैं और यह भी बताते हैं कि पहले उन्होंने लगभग डेढ़ साल भारतीय सेना में अपनी सेवाएं भी दी हैं। राम मिश्रा देव साहब के लिए प्रशंसा और लगाव जाहिर करते हुए, देव साहब के कैंप में काम करने सीखने की ललक जाहिर करते हैं। दोनों के बीच बातचीत के लम्बे दौर के बाद प्रेमप्रकाश 3 दिन बाद राम मिश्रा को दोपहर 2.00 बजे नवकेतन के ऑफिस आने को कहते हैं। राम मिश्रा देव साहब की एक फिल्म ‘दुनिया‘ (1968) का ये गाना गुनगुनाते हुए लौट जाते हैं- ‘‘दूरियां नजदीकियां बन गयीं, अजब इत्तेफाक है‘‘।
(क्रमशः... राम मिश्रा देव साहब से कब और कैसे मिले, लेख श्रखला के भाग 2 में प्रस्तुत किया जाएगा)
राम मिश्रा जी से मेरी पहली मुलाकात मुंबई में 2012 में हुई। उनकी सिफारिश पर ही स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन में मेरा राइटर्स कार्ड बना। उसके बाद बमुश्किल 2-3 छोटी छोटी मुलाकातें हो पायीं, हाँ, मैसेज आदि के जरिये संपर्क बना रहा, उनके व्यक्तित्व, स्नेह और आशीर्वाद की अनुभूति भी सदैव बनी रही। मैं 21 दिसंबर, 2020 को किसी कार्य से मुम्बई गया था, तब उनके संस्मरणों को लेखनीबद्ध करने विचार आया। राम मिश्रा भैय्या ने उनसे मुलाकात करने का मेरा आग्रह सहर्ष स्वीकार करते हुए मेरे सवालों का बहुत रोचक जवाब दिया।
प्रस्तुत लेख श्रृंखला मेरे सवालों और राम मिश्रा भैय्या के जवाबों पर आधारित है।
- मनोज श्रीवास्तव, ईमेलः उंदवरेीतपअ/हउंपसण्बवउ


