हंसमुख व्यंग्य *चरित्र का चीरहरण *

डॉ बालाराम परमार 'हंसमुख'

देवताओं में गणेश और मानव मूल्य में चरित्र का हर युग में पहला स्थान रहा है । गणेश जी  तो जैसे तैसे अपने पुराने पायदान पर कायम हैं। गणेश जी कलयुग में भी अपनी साख कायम रखने में इसलिए कामयाब हुए हैं, क्योंकि उन्होंने अहंम भाव को त्याग  अपनी सवारी के लिए 'माउस' को चुना। खाने पीने की वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों के बावजूद लंबोदर धारण किए हैं, ताकि महंगी  सब्जियां और जहरीले फलों  को पचाया जा सके। तमाम प्रदूषण तथा बदबूदार हवा की उपस्थिति के बावजूद उन्होंने नाक का ऑपरेशन नहीं करवाया ! लंबा चौड़ा कारोबार होने के बावजूद लाल बाग के राजा ने आंखें छोटी छोटी ही रखी। धन्य हो प्रथम नागरिक  श्री गणेश!!


   इधर  कलयुग में बेचारा इंसान का चरित्र दर-दर की ठोकरें खाता फिर रहा है । जिसके कभी सतयुग में घमंड  से पांव धरती पर नहीं टिकते थे ? चरित्र भूल गया कि बिना लगाम के घोड़े का सवार कभी न कभी गिरता है?  बड़ी बड़ी डींगें हांकने के चक्कर में बड़े-बड़े अखाड़ों और घरानों में रहने का आदी हो गया । भोली भाली सुरत पर धूणी रमाए साधु संतों और फकीरों के भरोसे अपनों को छोड़ दिया ! फिर क्या था? बड़े बड़े घराने और साधु, संत, महात्मा और फकीर निहाई की चोरी और सुई का दान करने लगे ।चैले चपाटों ने भी बहती गंगा में हाथ धोया। चरित्र के हवा में पुल बांधने लगे। चरित्र अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने लगा । फिर क्या था? कलयुग आते ही चरित्र  ओंधे मुंह धराशाई हो गया। आजकल मानव मूल्यों में यदि कोई सबसे ज्यादा संदेह के घेरे में है तो वह है चरित्र। आदमी का चरित्र!!

      वैसे तो 21वीं सदी में चरित्र का बखान करना विकृत मानसिकता की श्रेणी में आता है , क्योंकि आजकल चरित्र के मायने ज़रा ज्यादा ही बदल गए  हैं। चरित्र का चरित्र तो ऐसे बदला जैसे जंगल का राजा सर्कस में बदलता है। चरित्र का व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली, सा हो गया है। जितने भी लोगों पर चरित्रवान होने का लेबल लगा है , वे सब के सब संदेह के घेरे में आ गए हैं। क्या संत, क्या महंत? क्या रक्षक , क्या शिक्षक? क्या नेता या अभिनेता ? क्या चिकित्सक,  क्या विभिषण? सब के सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नजर आने लग  हैं। सत जुग में महापुरुषों का चरित्र संदेह के घेरे में आता ही नहीं था ।आज विडंबना देखिए, चरित्र संदेह के  घेरे से बाहर ही नहीं  आ रहा है!!


        सत्य का उदघाटन तो यह है कि चरित्र के साथ खिलवाड़  तो सतयुग में ही  होने लग गया था । हंसमुख हरबोले का तो यहां तक कहना है कि  स्वेत  वस्त्रधारी, जटाधारी, कमडलधारी  आदि का  चरित्र तो संदेह के घेरे में तभी से आ गया था, जब रावण ने साधु के भेष में   सीताजी का धोखे से अपहरण किया  था। उसी घटनाक्रम के चलते  राम ने रजक के कहने पर पवित्र सीता के चरित्र पर संदेह कर डाला। अग्नि परीक्षा लेकर रामजी ने चरित्र को चरित्र के घर ही घेरे में खड़ा कर दिया!  इसके बाद तो राजा और रंक, साधु और संत, स्त्री और पुरुष, सभी के द्वारा चरित्र की धज्जियां उड़ती चली गई। न  आदमी का आदमी सा चरित्र रहा,न आदमी चरित्रवान ? दोस्तों को आस्तीन का सांप  बनने में देर नहीं लगती। साध्य और साधन दोनों ही रूप में चरित्र पतन के रास्ते पर ला कर खड़ा कर दिया गया । चरित्र का चीरहरण वैसे ही  होने लगा जैसे आजकल अमीरों द्वारा गरीबों के  अधिकारों का होता है। अब बेचारा चरित्र परित्यक्ता  की भांति  यहां वहां मारा मारा फिर रहा है। माया की तरह न वानप्रस्थ के पास और न गृहस्थी जीवन जीने वालों के पास। इधर तमाम नियम कानून के बावजूद  मीडिया ने तो  आजकल हद पार करके , न्यायाधीशों के चरित्र  तक को भी  संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया  है। मिडिया मुंह फाड़कर कहता है कि न्याय के मंदिर में  न्यायाधिशों द्वारा न्याय का चीरहरण  हो रहा है !!


      पिछले कुछ दशकों से  फिल्मीस्तान  के कलाकारों ने चरित्र का चीरहरण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अदाकाराओं  ने अदा -प्रदा के नाम पर  अर्धनग्न होकर कुंवारेपन में  जो धमाल किया , उसका कोई शानी नहीं है? मुंबईया चाल , डाल और बाल के कारण  युवाओं का चरित्र  आसमान से गिर कर  खजूर पर अटक गया है। युवक लटक मटक झटक के अंधभक्त होकर  यहां वहां मुंह मारने लगे हैं । लार टपका टपका कर युवाओं  की  सोच इतनी घटिया हो गई है कि घिनौनी हरकत करने  तनिक भी शर्म नहीं आती। मानव का चरित्र तार से बेतार हो गया है। चरित्रहीन संस्कृति का घर संसार इतना गन्दा हो गया कि वहां से जो भी इसकी बुराई से कितना भी बचना चाहता है , बच नहीं सकता ।जब गांव -शहर सब जगह चरित्र का चीरहरण होने लगा और चरित्रहीन संस्कृति का बोलबाला ज्यादा होने लगा तो बेचारे चरित्र ने शिक्षक समाज की शरण  लेने की सोची , लेकिन हाय रे चरित्र का दुर्भाग्य । वहां भी बटुकनाथ ने उहकी बखिया उधेड़ दी । अब चरित्र दुखी है। जाए तो जाए  कहां ।मठ में मठाधीश , न्यायलय में न्यायाधीश, सदन में प्रतिनिधि, कार्यालय में बाबू -अधिकारी सब के सब बेईमानी  के दिवानें  हैं। बाबू ,कर्मचारी और अधिकारियों की करतूतों ने तो नाक में दम कर रखा है। तंगाकर  चरित्र गरीबों की झोपड़ी में शरण लेने गया तो वहां भी मधु कोड़ा ने धन दोलत के कोड़े मार-मार कर अधमरा कर दिया। खिलाड़ियों ने पहले से ही मैच फिक्सिंग कर अपने को चरित्रवान होने की श्रेणी से अलग कर लिया। रही सही कमर आसाराम बापू और राम रहीम ने तोड़ दी। अब नारद मुनि भी नारायण नारायण  नहीं बोल सकते । वरना उनको नारायण दत्त का पक्षधर  मान लिया जाएगा ।  समूची कार्यपालिका , न्यायपालिका और विधायिका  दृष्ट राष्ट्र का परिचय दें ,तब चरित्र को मानव मूल्य परिवार में रहने का कोई हक नहीं!!


जब कलयुग में चरित्र को इतनी लताड़ना साहनी पड़ी तो बेचारा मृत्युलोक में ब्रह्मा जी के पास जाकर  बोला :- "हे देवाधिदेव, मुझे मानव मूल्यों की प्रथम श्रेणी से हटाकर अमानवीय की सूची में डाल दो प्रभु। कलयुग, जिसे हंसमुख हरसोला द्वारा संवेदनहीन युग की संज्ञा दी जा रही है। चरित्र के नाम पर भयंकर राजनीति हो रही है । आजकल चरित्र न सत्ता पक्ष का रहा और न विपक्ष का?न स्त्रीलिंग में रहा न पुल्लिंग में ? न गांव में रहा,न शहर में? निकट भविष्य में भी जल थल नभ में चरित्र की उपस्थिति का आभास नहीं होता!  क्या करूं प्रभु! न जाने क्यों मैं हर कौम से नदारद हो गया हूं ! 


अतः  चरित्र के चीरहरण  पर  शेर अर्ज  किया है :
चर से चरित्र बना, चर चर गया चरित्र ।
चारों ओर चरित्र हीनता, मर मर गया चरित्र।।



Post a Comment

أحدث أقدم