ग्राहकों को ठगने का जरिया एमआरपी


आज से 6 वर्ष पहले इस विषय पर 3 जून 2015 को नवभारत टाइम्स में तत्कालीन बीजेपी राज्यसभा सांसद विजय गोयल ने एक ब्लॉग पोस्ट किया था।

https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/mrp-is-just-to-make-fool-customers1/

 

विजय गोयल ने ब्लॉग में लिखा- सब कहते हैं महंगाई का जमाना है। मैं कहता हूं कि एमआरपी के जरिये ठगी हो रही है, इसलिए चीजें महंगी हैं। अगर एमआरपी की व्यवस्था पर अंकुश लगा दिया जाए, तो सभी पैक्ड सामान सस्ते हो जाएंगे। एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस, यानी वह कीमत, जो किसी पैक्ड सामान पर छापी जाती है, यानी वह मूल्य जिससे ज्यादा पर कोई सामान ग्राहक को नहीं बेचा जा सकता। अगर मैं दावा करूं कि बाजार में कई सामान ऐसे हैं, जिन पर छापी गई एमआरपी उनकी असल कीमत से बीस गुना ज्यादा है, तो क्या आप यकीन करेंगे? मंत्रालय के जवाब में सबसे दिलचस्प बात मुझे यह नजर आई कि कमेटी ने ग्राहकों के हित साधने के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का सुझाव दिया था। अब सवाल यह है कि एमआरपी का झोल किस तरह प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है? जब एमआरपी पर 70-80 फीसदी तक बार्गेनिंग की गुंजाइश होगी, तो इससे बाजार में मुकाबला बढ़ेगा या बाजार अस्थिर हो जाएगा? मेरी अपील है कि मोदी सरकार एमआरपी के मामले में सख्त कदम उठाए, ताकि सरकारी नियमों पर आधारित यह धांधली बंद हो सके।

 

आवश्यक वस्तु अधिनियम वर्ष 1955 में अधिनियमित किया गया था। ... सरकार, अधिनियम के तहत, किसी भी पैकेज्ड उत्पाद की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) तय कर सकती है तथा इसे आवश्यक वस्तुघोषित कर सकती है। आवश्यक वस्तुओं में पेट्रोलियम (पेट्रोल, डीजल, नेफ्था और सोल्वेंट्स आदि), खाना (बीज, वनस्पति, दाल, गन्ना, गुड़, चीनी, चावल और गेहूं आदि), टेक्सटाइल्स, जरूरी ड्रग्स, फर्टिलाइजर्स शामिल है। सरकार द्वारा इस सूची में समय-समय पर बदलाव होता रहता है। हाल ही में सरकार ने मास्क और सैनिटाइजर को भी सूची में शामिल किया था। आवश्यक वस्तुओं और इनके पैक की MRP की तो यदा-कदा  निगरानी होती रहती है किन्तु अन्य वस्तुओं की MRP मनमाने ढंग से प्रिंट किये जाने का हाल इनके पैक बताते हैं।

 

यह एम.आर.पी एक बहुत बड़ा खेल है और अगर सरकार चीज़ों के दाम की कॉस्ट-स्टडी कराए तो चीज़ों के दाम आधा हो सकते हैं। इस खेल में आम आदमी को तो लूटा ही जा रहा है परंतु सरकार को भी मिलने वाले टैक्स में अच्छा-ख़ासा चूना लग रहा है। अगर सरकार एम.आर.पी. को युक्ति-संगत बना सके तो महँगाई 50% तक अपने अपने-आप कम हो सकती है, जिससे आम आदमी को तो राहत मिलेगी ही, सरकार की चिंता भी कम हो जाएगी। आज हालत यह है कि अगर किसी वस्तु की लागत एक सौ रुपये है तो ग्राहक तक पहुँचने पर उसी वस्तु की कीमत चार-पांच सौ रुपये तक पहुँच जाती है और उस पर एम.आर.पी पंद्रह सौ रुपये छाप दी जाती है। आख़िर वह कौन सा जादू है, जिसके तहत सौ रुपये की वस्तु पंद्रह सौ की हो जाती है, सरकार को इसकी जाँच ज़रूर करनी चाहिए।

 

सरकार ने MRP निर्धारित करने का अधिकार उत्पादक कंपनियों को ही दे दिया है। यह एक तरह से जनता को लूटने के लिये खुली छूट है। सरकार को MRP निर्धारण का अधिकार SEBI जैसी किसी स्वतंत्र नियामक को देना चाहिये, जो उत्पादन लागत के आधार पर MRP निर्धारित करे।

 

आजकल करीब-करीब सभी उत्पादक 30% से 70% का डिसकाउंट कॉम्पिटिशन होने की वजह से दे रहे है,अगर डिसकाउंट को सरकार द्वारा बंद करने के आदेश आ जाएँ, तो बिना डिस्काउंट प्राइस लिस्ट जारी की सकती है, जो कि वास्तविक होगी, जिसका सभी उत्पादक पालन करेंगे।

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