विजय आंनद गोल्डी की कहानी - राम मिश्रा की जुबानी - भाग - 2

भाग - 1 का सारांश - झांसी से मुम्बई आये हुए राम मिश्रा काफी मशक्क्त के बाद विजय आनंद के असिस्टेंट प्रेमप्रकाश से मिलते हैं, प्रेमप्रकाश 3 दिन बाद राम मिश्रा को दोपहर 2.00 बजे नवकेतन के ऑफिस आने को कहते हैं। राम मिश्रा देव साहब की एक फिल्म ‘दुनिया‘ (1968) का ये गाना गुनगुनाते हुए लौट जाते हैं- ‘‘दूरियां नजदीकियां बन गयीं, अजब इत्तेफाक है‘‘।


राम मिश्रा वापस लौटकर टाइम पास करने के लिए न्यूजपेपर पढ़ने लगते हैं, उसमें किसी मैगजीन के लिए कमीशन पर विज्ञापन लाने के काम का क्लासिफाइड दिखता है। राम मिश्रा इस कमीशन वाले काम को 3 दिन खाली बैठने से अच्छा समझकर आसपास की दुकानों, कारखानों और कंपनियों के चक्कर लगाते हैं। राम मिश्रा चाहते तो थे कि मैगजीन के लिए कहीं से चैथाई पेज का एकाध छोटा मोटा विज्ञापन ही मिल जाए, किन्तु एक कंपनी के मालिक राम मिश्रा की बातचीत और शैली से प्रभावित हो कर फुल पेज का याने 250 रूपये का विज्ञापन देते हैं। राम मिश्रा को कमीशन में 62 रूपये 50 पैसे मिलते हैं, 1969 के हिसाब से यह एक अच्छी रकम थी।


ज्यादातर महान कार्य सपने के साथ शुरू होते हैं। डॉ जमशेद जहांगीर भाभा ने भी मुंबई में कला और संस्कृति केंद्र की स्थापना का सपना देखा और उसे पूरा करने में साथ दिया प्रोफेसर रुस्तम और जेआरडी टाटा के दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने। 1969 में मुंबई के नरीमन पॉइंट पर नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स NCPA का निर्माण कार्य पूर्णता की ओर अग्रसर था। डॉ भाभा भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के कार्य में देरी नहीं करना चाहते थे और इसीलिए दक्षिण मुंबई, ब्रीच कैंडी एरिया में माधुरी देसाई द्वारा उपलब्ध कराये गये भूलाभाई देसाई मेमोरियल परिसर के अस्थायी आवास में एनसीपीए की शुरुआत की। इस अस्थायी आवास में अत्याधुनिक स्टूडियो और प्रकाश व्यवस्था के साथ एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो और 100 सीटर सभागार बनाया गया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 29 दिसंबर, 1969 को स्टूडियो, ऑडिटोरियम और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। इसके साथ एक सप्ताह तक चलने वाले समारोह में पी.एल. देशपांडे, यामिनी कृष्णमूर्ति और पंडित रविशंकर के कार्यक्रम हुए।



3 दिन बाद राम मिश्रा आतुरतावश निर्धारित समय से 3 घंटे पहले याने दोपहर 12 बजे ही नवकेतन के ऑफिस की सीढ़ियां चढ़कर कॉलबेल का बटन दबाते हैं, एक ऑफिस ब्यॉय दरवाजा खोलकर बिना कुछ पूछे राम मिश्रा से बोलता है - ‘‘अभी देव साहब नहीं आये हैं‘‘, और दरवाजा बंद कर देता है। ये बहुत अटपटा लगता है पर राम मिश्रा बाहर खड़े रहते हैं। काफी समय बीत जाता है, राम मिश्रा अपने ख्यालों में गुम बाहर खड़े रहते हैं कि तभी पीली पैंट और नीली शर्त पहने एक स्मार्ट सा व्यक्ति ऑफिस की सीढ़ियां बहुत फुर्ती से खट खट करते चढ़ता है। राम मिश्रा के कानों में एक आवाज गूंजती है - हैलो यंग मैन, व्हाट यू वांट? सवाल पूछने वाले की तरफ देखते ही राम मिश्रा अवाक रह जाते हैं क्योंकि उनके सामने  पीली पैंट और नीली शर्त पहने देव आनंद साहब खड़े थे, उन दिनों देव साहब ने अपनी पफ (लच्छेदार) हेयर स्टाइल छोड़कर, सीधे बालों वाली स्टाइल अपना ली थी। राम मिश्रा ऑफिस के गेट के सामने ही खड़े थे, देव साहब कहते हैं - विल यू प्लीज अलाउ मी टू गो इनसाइड? राम मिश्रा कालबेल बजाते हुए एक साइड हो जाते हैं। देव साहब अंदर जाते समय राम मिश्रा से कहते हैं - कम अलांग।  मंत्रमुग्ध राम मिश्रा देव साहब के पीछे पीछे चल देते हैं।


नवकेतन के ऑफिस में देव साहब और विजय आनंद ‘गोल्डी‘ के चैम्बर्स के अलावा कुछ स्टाफ के केबिन्स भी थे, जिनके दरवाजे देव साहब के अंदर जाते समय खुले हुए थे। अपने चैम्बर की तरफ जाते समय देव साहब सभी से गुड आफ्टरनून, हैल्लो, हाय, हाउ आर यू , याने कुछ ना कुछ जरूर कहते हैं। देव साहब किसी से पूछते हैं - गोल्डी आया, जवाब आता है - नो सर।  ओके, आने पर उसको मिलने बोलना - ऐसा कह कर देव साहब अपने चैम्बर में जाते हैं, राम मिश्रा भी पीछे पीछे अंदर चले जाते हैं। चैम्बर में देव साहब को मिले हुए अवार्ड्स रखे हुए थे और उनकी कुछ पिछली फिल्मों के पोस्टर लगे हुए थे। देव साहब अपने अंदाज में चेयर पर पैर रखकर कहते हैं - यूं वांट टू मीट मी! राम मिश्रा कहते हैं - यस  सर! देव साहब कहते हैं - मुझसे मिल लिए और कुछ! राम मिश्रा कहते हैं - मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं। देव साहब पूछते हैं - कहां से आये हो? राम मिश्रा कहते हैं - फ्रॉम झांसी सर, वहां आपकी फिल्म ‘‘लव मैरिज‘‘ की शूटिंग भी हुई थी।


‘‘ओ यस, आई रिमेम्बर झांसी, ब्यूटीफुल सिटी, माई कर्नल ब्रदर-इन-लॉ वाज पोस्टेड देयर‘‘ - ऐसा कहते हुए देव साहब झांसी से जुड़ी अतीत की यादों में खो जाते हैं।

प्रस्तुत लेख श्रृंखला - भाग 2, मेरे सवालों और राम मिश्रा भैय्या के जवाबों पर आधारित है।

- मनोज श्रीवास्तव

ईमेलः manojshriv@gmail.com

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