अमेजान नदी दुनिया की सबसे बड़ी नदी है। अमेजान नदी में
दुनिया का सबसे ज्यादा पानी है। लेकिन अमेजान नदी जहां से निकलती है,
वह जगह सब भारतीयों को घुमाने जैसी है। और कहीं उन्हें ले जाने की जरूरत नहीं है।
सब भारतीयों को अमेजान नदी के उदगम स्रोत पर जरूर ले जाकर खड़ा कर देने जैसा है।
वहां, जहां से अमेजान निकलती है, वहां से सिर्फ एक-एक बूंद टपकती है। और एक-एक बूंद के टपकने में भी दो
बूंद के बीच में बीस सेकेंड का फासला है। एक बूंद गिरती है, फिर बीस सेकेंड बाद दूसरी बूंद गिरती है। यह अमेजान नदी का उदगम स्रोत है!
कितना सौभाग्य होता इस नदी का कि यहीं तृप्त हो जाती और संतुष्ट हो जाती। तो यह एक
बूंद ही रह जाती! शायद बूंद भी न रह जाती। लेकिन यह अमेजान सागर बन जाती है।
यात्रा करती है असंतोष की- और आगे, और आगे, और आगे, भागी चली जाती है।
भारत की प्रतिभा बूंद रह गई है, सागर नहीं बन पाई है। संतोष पकड़ गया है। जो है, चुपचाप स्वीकार कर लो। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैं, आवश्यकताएं कम करो। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैं, सिकुड़ो, सिकुड़ो, सिकुड़ो, बिलकुल बूंद रह जाओ। हमारे शिक्षक समझा रहे हैं, सब सिकोड़ो। जीवन कहता है, फैलो; जीवन कहता है, विस्तार करो; जीवन कहता है, जाओ दूर को और अनंत को। और हमारे
शिक्षक कहते हैं, सिकुड़ो, सीमा
छोटी करो, और छोटी करो; जितनी
भी है, बड़ी है- और सिकुड़ो, और
सिकुड़ो, और मर जाओ, कब्र में
समा जाओ तो परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे।
जिंदगी का सूत्र है, विस्तार। एक बीज बो दें
तो एक वृक्ष पैदा होता है। छोटा-सा बीज इतना बड़ा वृक्ष बन जाता है कि हजार
बैलगाड़ियां उसके नीचे विश्राम करें। और एक छोटा-सा बीज बो दें तो उस वृक्ष पर
अरबों बीज पैदा होते हैं। कितना फैलाव कर लिया एक बीज ने? एक छोटा-सा बीज फैल कर अरब बीज हो गया! अरब बीज बो दें, फैलता चला जाएगा, फैलता चला जाएगा। जीवन
विस्तार है।
मेरी दृष्टि में
ब्रह्म का एक ही अर्थ है, फैलाव, विस्तार; जो फैलता ही चला जाता है; जो रुकता ही नहीं, जो रुकता ही नहीं, जो अंतहीन फैलाव है। ब्रह्म का मतलब होता है, दि एक्सपैंडिंग। जिसे पहली दफे ब्रह्म शब्द सूझा होगा, वह आदमी
अदभुत रहा होगा, क्योंकि ब्रह्म का मतलब होता है फैलना-
फैलते ही चले जाना; फैलते ही चले जाना। लेकिन कितना
अदभुत है, जिन लोगों ने ब्रह्म शब्द खोजा, उन्हीं लोगों ने सिकोड़ने की फिलासफी खोजी। वे कहते हैं, सिकुड़ते चले जाओ--अपरिग्रह, अनासक्ति, त्याग, वैराग्य--सिकुड़ो, छोड़ो, जो है उससे भागो और सिकुड़ते जाओ, सिकुड़ते जाओ, जब तक बिलकुल मर न जाओ तब तक
सिकुड़ते चले जाओ।
संतोष इसका आधार
बना, सिकुड़ना इसका क्रम बना, और भारत की आत्मा सिकुड़
गई और संतुष्ट हो गई। अब जरूरत है कि फैलाओ इसे। इस चौराहे पर फैलने का निर्णय
लेना पड़ेगा। छोड़ो संतोष, लाओ नए असंतोष, नए डिसकंटेंट। दूर को जीतने की, दूर को पाने की, दूर को उपलब्ध करने की आकांक्षा को जगाओ, अभीप्सा
को जगाओ, कि जो भी पाने योग्य है पाकर रहेंगे; जो नहीं पाने योग्य है, उसको भी पाकर रहेंगे; तो इस मुल्क की प्रतिभा में प्राण आएं, तो इसके
भीतर से कुछ जगे। क्योंकि जब भी कुछ जगता है, तब फैलना चाहता है। और जब फैलना नहीं चाहते आप तो सोने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह जाता। सो
जाता है सब।
इसलिए आज की
चर्चा में यह दूसरा सूत्र दोहरा दूं और बात पूरी करूं। विश्वास नहीं, चाहिए विचार। अंधापन नहीं, चाहिए संदेह। अंधे
विश्वासों की शृंखलाएं नहीं, चाहिए वैज्ञानिक चिंतन।
संतोष नहीं, चाहिए असंतोष। अगति नहीं, चाहिए गति, चाहिए
अभीप्सा- अनंत को जीत लेने की, फैल जाने की।
काश भारत के मन
में अनंत की यह अभीप्सा जाग जाए तो हम अपनी सोई हुई आत्मा को पुनः जगा सकते हैं।
और ध्यान रहे, जागा हुआ भारत ही निर्णय ले सकेगा कि इस चौराहे से कहां जाए; सोया हुआ भारत तो इसी चौराहे पर अफीम खाकर सोया रहेगा। अफीम के हमने
अच्छे-अच्छे नाम रखे हैं। किसी अफीम की पुड़िया पर कुछ और, किसी अफीम की पुड़िया पर कुछ और। भक्तगण अफीम
की पुड़िएं लेकर चौरस्ते पर सो रहे हैं। …और आप
पूछते हैं कि समाज परिवर्तन के चौराहे पर? और समाज अफीम
खाकर सोया हुआ है! कौन परिवर्तन? कैसा चौराहा? कहां जाना है? झंझट में मत पड़ो- अफीम लो, सो जाओ। सोने से ज्यादा सरल, सुविधापूर्ण और
कुछ भी नहीं है। ~ ओशो
