एक एक कदम - (प्रवचन-06) - समाज परिवर्तन के चौराहे पर - ओशो


प्रस्तुति - दिनेश जैन, विशेष संवाददाता, 'चेतना', ईमेल dkjain2705@gmail.com

 

अमेजान नदी दुनिया की सबसे बड़ी नदी है। अमेजान नदी में दुनिया का सबसे ज्यादा पानी है। लेकिन अमेजान नदी जहां से निकलती है, वह जगह सब भारतीयों को घुमाने जैसी है। और कहीं उन्हें ले जाने की जरूरत नहीं है। सब भारतीयों को अमेजान नदी के उदगम स्रोत पर जरूर ले जाकर खड़ा कर देने जैसा है। वहांजहां से अमेजान निकलती हैवहां से सिर्फ एक-एक बूंद टपकती है। और एक-एक बूंद के टपकने में भी दो बूंद के बीच में बीस सेकेंड का फासला है। एक बूंद गिरती हैफिर बीस सेकेंड बाद दूसरी बूंद गिरती है। यह अमेजान नदी का उदगम स्रोत है! कितना सौभाग्य होता इस नदी का कि यहीं तृप्त हो जाती और संतुष्ट हो जाती। तो यह एक बूंद ही रह जाती! शायद बूंद भी न रह जाती। लेकिन यह अमेजान सागर बन जाती है। यात्रा करती है असंतोष की- और आगेऔर आगेऔर आगेभागी चली जाती है।

 

भारत की प्रतिभा बूंद रह गई हैसागर नहीं बन पाई है। संतोष पकड़ गया है। जो हैचुपचाप स्वीकार कर लो। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैंआवश्यकताएं कम करो। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैंसिकुड़ोसिकुड़ोसिकुड़ोबिलकुल बूंद रह जाओ। हमारे शिक्षक समझा रहे हैंसब सिकोड़ो। जीवन कहता हैफैलोजीवन कहता हैविस्तार करोजीवन कहता हैजाओ दूर को और अनंत को। और हमारे शिक्षक कहते हैंसिकुड़ोसीमा छोटी करोऔर छोटी करोजितनी भी हैबड़ी है- और सिकुड़ोऔर सिकुड़ोऔर मर जाओकब्र में समा जाओ तो परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे।

 

जिंदगी का सूत्र हैविस्तार। एक बीज बो दें तो एक वृक्ष पैदा होता है। छोटा-सा बीज इतना बड़ा वृक्ष बन जाता है कि हजार बैलगाड़ियां उसके नीचे विश्राम करें। और एक छोटा-सा बीज बो दें तो उस वृक्ष पर अरबों बीज पैदा होते हैं। कितना फैलाव कर लिया एक बीज नेएक छोटा-सा बीज फैल कर अरब बीज हो गया! अरब बीज बो देंफैलता चला जाएगाफैलता चला जाएगा। जीवन विस्तार है।

 

मेरी दृष्टि में ब्रह्म का एक ही अर्थ है फैलावविस्तारजो फैलता ही चला जाता हैजो रुकता ही नहींजो रुकता ही नहींजो अंतहीन फैलाव है। ब्रह्म का मतलब होता हैदि एक्सपैंडिंग। जिसे पहली दफे ब्रह्म शब्द सूझा होगावह आदमी अदभुत रहा होगाक्योंकि ब्रह्म का मतलब होता है फैलना- फैलते ही चले जानाफैलते ही चले जाना। लेकिन कितना अदभुत हैजिन लोगों ने ब्रह्म शब्द खोजाउन्हीं लोगों ने सिकोड़ने की फिलासफी खोजी। वे कहते हैंसिकुड़ते चले जाओ--अपरिग्रहअनासक्तित्यागवैराग्य--सिकुड़ोछोड़ोजो है उससे भागो और सिकुड़ते जाओसिकुड़ते जाओजब तक बिलकुल मर न जाओ तब तक सिकुड़ते चले जाओ।

 

संतोष इसका आधार बनासिकुड़ना इसका क्रम बनाऔर भारत की आत्मा सिकुड़ गई और संतुष्ट हो गई। अब जरूरत है कि फैलाओ इसे। इस चौराहे पर फैलने का निर्णय लेना पड़ेगा। छोड़ो संतोषलाओ नए असंतोषनए डिसकंटेंट। दूर को जीतने कीदूर को पाने कीदूर को उपलब्ध करने की आकांक्षा को जगाओअभीप्सा को जगाओकि जो भी पाने योग्य है पाकर रहेंगेजो नहीं पाने योग्य है, उसको भी पाकर रहेंगेतो इस मुल्क की प्रतिभा में प्राण आएंतो इसके भीतर से कुछ जगे। क्योंकि जब भी कुछ जगता है, तब फैलना चाहता है। और जब फैलना नहीं चाहते आप तो सोने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह जाता। सो जाता है सब।

 

इसलिए आज की चर्चा में यह दूसरा सूत्र दोहरा दूं और बात पूरी करूं। विश्वास नहींचाहिए विचार। अंधापन नहींचाहिए संदेह। अंधे विश्वासों की शृंखलाएं नहींचाहिए वैज्ञानिक चिंतन। संतोष नहींचाहिए असंतोष। अगति नहींचाहिए गतिचाहिए अभीप्सा- अनंत को जीत लेने कीफैल जाने की।

 

काश भारत के मन में अनंत की यह अभीप्सा जाग जाए तो हम अपनी सोई हुई आत्मा को पुनः जगा सकते हैं। और ध्यान रहेजागा हुआ भारत ही निर्णय ले सकेगा कि इस चौराहे से कहां जाएसोया हुआ भारत तो इसी चौराहे पर अफीम खाकर सोया रहेगा। अफीम के हमने अच्छे-अच्छे नाम रखे हैं। किसी अफीम की पुड़िया पर कुछ औरकिसी अफीम की पुड़िया पर कुछ और। भक्तगण अफीम की पुड़िएं लेकर चौरस्ते पर सो रहे हैं। और आप पूछते हैं कि समाज परिवर्तन के चौराहे परऔर समाज अफीम खाकर सोया हुआ है! कौन परिवर्तनकैसा चौराहाकहां जाना हैझंझट में मत पड़ो- अफीम लोसो जाओ। सोने से ज्यादा सरलसुविधापूर्ण और कुछ भी नहीं है। ~ ओशो

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