कभी-कभी व्यापार और उद्योग के मन की बात भी सुननी
चाहिये। व्यापार और उद्योग के
मन की कुछ ऐसी 5 बातें:
1. लॉकडाउन के समय व्यापार और उद्योग का कार्य 50% तक सिकुड़
जाता है। कोई-कोई व्यवसाय जैसे खानपान के होटल का काम तो पूरी तरह से ठप्प पड़ जाता
है। ऐसी स्थिति में इनमें काम करने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान तो क्या,
किराया और बिजली बिल भरने के भी लाले पड़ जाते हैं। ऊपर से बैंक
की क़िस्त और ब्याज। किसी किसी प्रकार के फिनिश्ड गुड्स की शेल्फ लाइफ बहुत काम होती
है,
जिनका मूल्य एक निश्चित समय के बाद शून्य हो जाता है। क्या इन्हें इस विषम परिस्थिति से बाहर निकालने के सार्थक उपाय नहीं
किये जाने चाहिये?
2. देशभर में उत्पादन, ट्रेड और सेवाओं से जुड़े कुल 6 करोड़ 33 लाख से ज्यादा कुटीर,
लघु और मझोले उद्यम (एमएसएमई) हैं,
जो लगभग 12 करोड़ लोगों रोजगार मुहैया कराते हैं और देश की जीडीपी
में लगभग 29 प्रतिशत का योगदान करते हैं। विभिन्न करों के माध्यम से ये एक बड़ा राजस्व
सरकार को देते हैं। सामान्य समय में भी ऐसे उद्यम स्थापित करना और चलाना साहस तथा जोखिम
का कार्य है। लॉकडाउन के समय तो इन सबकी हालत और भी पतली हो जाती है। अपने अच्छे समय
में करोड़ों रूपये का वेतन और टैक्स देने वाले ऐसे उद्यमियों
का बुरा समय आने पर क्या उनके जीवन यापन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने में कोई सहायता
नहीं दी जानी चाहिये?
3. लॉकडाउन के समय में इन उद्यमियों से जोर जबरदस्ती से टैक्स
और पेनाल्टी भरवाने सरकारी अधिकारियों का जो डंडा सख्ती से घूमता रहता है,
क्या यह मानवीय है, क्या
उस पर रोक नहीं लगायी जानी चाहिये?
4. लॉकडाउन की मार से किसी ऐसे उद्यमी को घाटे और दिवालियापन
से बचाने के लिये क्या सरकार के द्वारा कोई कदम नहीं उठाना
चाहिये?
5. सरकार लॉकडाउन के समय में कर्मचारियों के वेतन में किसी तरह
की कटौती से मना करती है और कोई उद्यमी भी मन से ऐसी कोई कटौती नहीं करना चाहता है,
पर विवश होता है। कारोबार ठप्प रहे तो कर्मचारियों को पूरी तनख्वाह
देना बहुत कठिन काम है। तो क्या वेतन का एक हिस्सा सरकार
को, एक हिस्सा उद्यमी को और एक हिस्सा कर्मचारी को वहन
नहीं करना चाहिये?
