सट्टेबाजी से रोजाना 1 करोड़ कमाने वाला मशहूर मटका किंग

देश के विभाजन के दौर में रतन खत्री पाकिस्तान के कराची से मुंबई आए और वहीं बस गए। इसके बाद से मुंबई ने अंडरवल्र्ड के दौर से लेकर आतंकी ब्लास्ट का दौर देखा। इन सबके बीच शहर में सट्टा भी फल-फूल रहा था। रतन खत्री ने ट्रेडिनशल जुएं को एक खास शैली दी, जिसमें मटके से नंबर निकाला जाता और उसे दिन का लकी नंबर मान लिया जाता था। इंटरनेट और मोबाइल न होते हुए भी सिर्फ टेलीफोन के उस दौर में मिनटों में ये नंबर पूरे देश में फैल जाता था। ये मटका किंग के जुएं की लोकप्रियता ही थी।


 


बात शुरू होती है साल 1962 से, वो एक ऐसा समय था, जब तत्कालीन बॉम्बे में रात 9 बजे जरूरी से जरूरी ट्रंककॉल भी नहीं हो पाते थे। वजह यह थी कि सारी टेलीफोन लाइनें पर सट्टेबाज होते, जो एक-दूसरे को वो लकी नंबर बता रहे होते थे, जो उस रोज मटका किंग ने घोषित किया होता था। एक रिपोर्ट के अनुसार जुएं के इस खेल की लोकप्रियता ऐसी बनी कि रात 9 बजे के आसपास डज्छस् सारे कॉल रोक दिया करता था ताकि सट्टेबाज लकी नंबर बांट सकें।


रतन खत्री ने जुएं की शुरुआत अकेले नहीं की थी, उनके साथ थे कच्छ के कल्याणजी गाला, जो साल 1944 में कच्छ छोड़कर मुंबई आ बसे थे। कल्याणजी तब एक सीधे-सादे आदमी थे, जो राशन की दुकान चलाते और वर्ली की चॉल में रहते थे। दुकान आने वाले लोगों के मुंह से न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज में सट्टे की कहानियां सुन-सुनकर कल्याणजी को भी इसका चस्का लगा। वहीं से सट्टे का लोकल वर्जन मटका शुरू हुआ। खेल की लोकप्रियता बढ़ने लगी क्योंकि चॉल में रह रहे कारखाना वर्कर भी इसमें 1 रुपए से खेल सकते थे। जल्दी ही ये वर्ली से जवेरी बाजार जा पहुंचा और वहीं इसका हेडक्वार्टर बन गया। दक्षिण मुंबई का ये बाजार अपनी तंग गलियों और सोने-चांदी के गहनों के लिए मशहूर था। वर्ली से जवेरी पहुंचने के साथ ही रतन खत्री मटके के जुएं में कल्याण जी के पार्टनर हो गए और काम चल निकला।


खत्री को अपराधियों के साथ पुलिस और लोगों से डील करना आता था। जुंआ अवैध होने के कारण उन्हें स्थानीय पुलिस को मिला कर रखना होता था। अपराधियों को हफ्ता देने होता था। बाद में कल्याणजी जुएं के खेल में खत्री से पिछड़ते गए और ‘रतन मटका‘ मशहूर होने लगा। यहां तक कि इसका रोजाना का टर्नओनर 1 करोड़ के आसपास हुआ करता था। इसका बड़ा कारण टेलीफोन का इस्तेमाल भी था। जहां तक फोन लाइन जाती थी, खत्री का जुंआ देश के उस हिस्से तक फैल चुका था।


खत्री ने अपने सट्टे के लिए तीन कार्ड चुनने का अनोखा तरीका निकाला। वो पब्लिक प्लेस पर घूमते हुए किसी भी रेंडम दुकानदार को चुनता और उससे भीड़ के बीच तीन कार्ड्स उठाने को कहता। इससे कार्ड चुनने में किसी तरह की चालाकी या बदमाशी जैसा डर भी लोगों के बीच नहीं रहा। बाद में खत्री के पास इतने पैसे हो गए कि वो फिल्म मेकरों को फाइनेंस करने लगा। कई बार लोकल दुकानदारों की बजाए वो फिल्म मेकरों से भी तीन कार्ड्स चुनने को कहता।


अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में दिवंगत ऋषि कपूर ने रतन खत्री का जिक्र किया है कि कैसे साल 1976 में एक फिल्म ‘रंगीला रतन’ बनवाते हुए खत्री कई शाम उन्हें या अशोक कुमार को फोन करते और और कार्ड चुनने को कहते। इसके बाद ये कार्ड नंबर उस रोज के लकी नंबर की तरह मिनटों में मुंबई में फैल जाता। ऋषि ने खत्री के टाइम मैनेजमेंट के बारे में बताते हुए लिखा था- एक बार खत्री बंगलुरु से मुंबई फ्लाय कर रहे थे। हवाई जहाज में फोन न होने के कारण मटका नंबर अनाउंस करने में देर हो रही थी। ऐसे में खत्री ने पायलेट की मदद ली और कंट्रोल टावर के जरिए मटका नंबर अनाउंस किया। जुएं के अवैध होने के बाद भी पुलिस इसमें कुछ न कर सकी क्योंकि ऐसा होने पर खेल के जुड़े आम-खास सभी नाराज हो जाते।


लगातार लोकप्रियता पाने के बाद भी रतन खत्री ने साल 1993 में मटके का सट्टा बंद कर दिया। इसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं। जैसे उसी साल खत्री अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने लंदन जा रहे थे लेकिन एयरपोर्ट पहुंचने पर पता चला कि अधिकारियों ने अवैध काम से जुड़ा होने की वजह से उनका नाम ‘नो फ्लाई लिस्ट‘ में डाल दिया था। यानी खत्री हवाई यात्रा नहीं कर सकते थे। परिवार के सामने इस तरह बेइज्जत होने के कारण उन्होंने जुएं का धंधा बंद करने का फैसला ले लिया।

-अर्जुन कुमार तिवारी

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