दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखे न कोय। जो ‘रहीम’दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।
भारत में कोरोना
संक्रमण के बढ़ने की अप्रत्याशित तेजी ने सभी को चिंता में डाल दिया है। पैर पसारती
इस महामारी के विरुद्ध केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और आमजन का एकजुट होना नितांत आवश्यक
है, तभी इसकी रोकथाम हो सकेगी। कागजों, आंकड़ों, योजनाओं, नीतियों, निर्देशों, नए-नए
सर्कुलरों, भाषणों, सरकारी विज्ञापनों के स्तर पर सब ठीकठाक है। पर अभी भी जमीनी स्तर
पर कोरोना से लड़ाई हेतु ठोस एवं प्रभावी क्रियान्वयन और व्यवस्थापन की नितांत आवश्यकता
है।
हम आमजन भी समझाने
से कम और सख्ती बरतने से ज्यादा मानते हैं। लॉकडाउन की स्थिति में हम में से अधिकांश
का काम होता है, किसी ना किसी बात को ज़रूरी बताते हुए घर से बाहर निकलना और अपने आप
को फैलते संक्रमण के हवाले करना या फिर हम घर में बैठे बैठे अपुष्ट, फेक समाचारों या
वीडियो को व्हाट्सएप्प और फेसबुक यूनिवर्सिटी के माध्यम से फैलाकर बहुगुणित करते रहते
हैं। कुल मिलाकर समस्या के बढ़ने के लिए सरकारें जितनी जिम्मेदार हैं, उतने ही हम भी
हैं। थोड़ा तो समझिये कि मास्क लगाना आवश्यकता है, मजबूरी नहीं। लापरवाही से हम न केवल
खुद को, बल्कि अपने परिवार, मित्र, सगे-सम्बन्धी, परिसर, मोहल्ले को भी खतरे में डाल
देते हैं।
जीवन-मरण के
संकट के आगे क्या यह अभी जरुरी है कि हम भीड़ जुटाकर जन्मदिन मनाएं, शादी के आयोजन करें,
हर पर्व में शामिल हों, तीर्थाटन करें? अभी तो समय है सजग रहने का, सतर्क रहने का।
चुनाव हो रहे हों, तो बेशक मतदान करें, सत्ता और पद की महत्वाकांक्षी राजनैतिक रैलियों
और सभाओं में जाने की क्या आवश्यकता है? समझ लीजिए, अगर कोरोना संक्रमित हो गए ना,
तो अच्छे दिन, सुनहरा कल दिखने वाले ये लोग आपकी कोई खैर-खबर नहीं लेने वाले। अगर इन
लोगों को सच में ही आपकी परवाह होती तो ये ऐसी भीड़ जुटाने वाली रैलियां और सभाएं नहीं
करते। चुनाव निपट जाने दीजिये, ये फिर शुरू हो जाएंगे, आये दिन सीख देंगे- मास्क लगाओ,
दो गज की दूरी रखो, बार-बार हाथ साबुन से धोओ, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करो, भीड़भाड़
वाली जगह में मत जाओ, फलां फलां।
अभी भी वक्त
है, सम्भल जाइये। देश में अब रोज लगभग 3.5 लाख नए कोरोना संक्रमित मरीज आने लगे हैं।
मृत्यु दर भी उछाल पर है। महामारी की इस अचानक तेजी के सामने अस्पताल, बेड, ऑक्सीजन
व्यवस्था, वेंटिलेटर्स, दवाइयां, इंजेक्शन, इन सबकी बहुत कमी महसूस की जा रही है। और
इन्हीं कमियों के कारण या तो ये सब समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं, या इनके मनमाने
दाम वसूले जा रहे हैं। वैसे ही तो रोजगार और जीवन यापन की समस्या मुंह बाए खड़ी है,
फिर इतने महंगे इलाज का खर्च कैसे उठाया जाएगा?
यदि कोई पेशेंट
कोरोना केयर हॉस्पिटल में येन केन प्रकारेण एडमिट हो भी जाए तो इलाज में लगने वाली
संभावित दवाइयां और इंजेक्शन कब, कैसे और कहाँ मिलेंगे, इस बात की कोई जानकारी पेशेंट
या उसके अटेंडेंट को नहीं दी जाती है। सामान्यतः इस सम्बन्ध में कोई सूचना भी पटल पर
नहीं होती है। लॉकडाउन या नाइट कर्फ्यू के समय किसी बाहर गाँव से आये पेशेंट का अटेंडेंट
कैसे और कहाँ से दवा और इंजेक्शन लाये। वैसे तो कोरोना के उपचार में लगने वाली दवा
और इंजेक्शन पर टैक्स माफ़ कर दिया जाना चाहिए, पर ऐसा होगा क्या? राजनेता, सरकार और
प्रशासन को चाहिए कि वे प्रत्येक कोरोना केयर हॉस्पिटल में "हेल्प डेस्क"
बनायें, जिसमें 24 घंटे जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारी तैनात हों ताकि दीन-हीन, विपन्न,
असहाय, वृद्ध, अबला मरीज और उसके अटेंडेंट को यथोचित मार्गदर्शन मिल सके। पर कोई इस
बारे में कोई सोचेगा भी क्या?
